विशेष राज्य के दर्जे के सवाल पर रविवार को आयोजित अधिकार यात्रा रैली में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक दांव ने केंद्र की सियासी हलचल तेज कर दी है।
अपने भाषण में साल 2014 में अपनी पार्टी का विकल्प खुला रखने के संकेत के साथ प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री की तारीफ कर जहां नीतीश ने अपने कांग्रेस कनेक्शन की चर्चाओं को और हवा दी, तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को आगे बढ़ाने में जुटी भाजपा को राजग से इतर राह पकड़ने की स्पष्ट चेतावनी।
इसके अलावा रैली में बिहार के विकास मॉडल की चर्चा के साथ पूरी लड़ाई को पिछड़ा राज्य बनाम विकसित राज्य बनाने की कोशिश दरअसल नीतीश की राष्ट्रीय राजनीति में बड़े दखल की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
वैसे भी दिल्ली में ही श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में मोदी के भाषण के बाद जद (यू) की रैली में सबकी निगाहें इसी पर टिकी थी कि नीतीश मोदी के संबंध में क्या बोलते हैं।
रामलीला मैदान में अपने लगभग 45 मिनट के भाषण में नीतीश ने मोदी पर सीधा हमला करने के बदले संकेतों से हमले की राह चुनी।
गुजरात मॉडल का नाम लिए बिना बिहार के सीमित संसाधनों वाला विकास मॉडल को समावेशी विकास वाला तथा सभी वर्गों को साथ लेने वाला मॉडल बताया तो विकसित राज्यों को देश की विकास दर में उतार-चढ़ाव लाने का जिम्मेदार भी ठहराया।
दरअसल अपने राजनीतिक हित में नीतीश मोदी से अपने खराब संबंधों और कांग्रेस कनेक्शन संबंधी प्रचार को चर्चा में बनाए रखना चाहते हैं। इसलिए विशेष राज्य का दर्जा संबंधी लड़ाई से बिहार भाजपा को पूरी तरह से दूर रखा।
गौरतलब है कि राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए के इतर यूपीए के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को जद (यू) के समर्थन के अप्रत्याशित फैसले ने नीतीश के कांग्रेस कनेक्शन की चर्चाओं को पुख्ता आधार प्रदान किया।
बाद में प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कई बार विकास के लिए बिहार सरकार की तारीफ कर और वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने आर्थिक सर्वेक्षण के बाद अपने बजट भाषण में विशेष राज्य का दर्जा देने संबंधी मापदंड में परिवर्तन की मंशा जता कर नीतीश को सकारात्मक जवाब दिया।
बहरहाल नीतीश के दबाव और प्रलोभन से कांग्रेस का असमंजस में आना और भाजपा का भयभीत होना स्वाभाविक है।