ऐतिहासिक शहर काशी अब जापान के क्योटो जैसी स्मार्ट सिटी बनेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच दिवसीय जापान यात्रा का आगाज शनिवार को दोनों देशों के बीच काशी को क्योटो की तर्ज पर विकसित करने के समझौते के साथ हुआ। इस तरह पीएम नरेंद्र मोदी ने 100 स्मार्ट शहर बनाने की अपनी महत्वाकांक्षी योजना की शुरुआत अपने संसदीय क्षेत्र काशी से कर दी। क्योटो में जापानी पीएम शिंजो अबे ने प्रोटोकॉल तोड़कर मोदी की अगवानी की।
दोनों प्रधानमंत्रियों की मौजूदगी में जापान में भारतीय राजदूत दीपा वाधवा और क्योटो के मेयर दायसाकू कादोकावा ने एमओयू पर दस्तखत किए। काशी की ही तरह क्योटो भी आध्यात्मिक शहर है, यहां कई प्राचीन विशाल मंदिर हैं, यह जापान में बौद्ध धर्म का केंद्र है। बुलेट ट्रेन और दूसरी कई खूबियों के चलते क्योटो को जापान का स्मार्ट सिटी कहा जाता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने बताया कि समझौते के तहत काशी की विरासत के संरक्षण, शहर के आधुनिकीकरण, कला, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में जापान सहयोग करेगा। दोनों देश इस दिशा में सहयोग के लिए एक रोडमैप तैयार करेंगे।
लेकिन काशी को जापान के क्योटो जैसा शहर बनाने की बात करने से पहले यह जान लेना जरुरी है कि आखिर दोनों शहरों में क्या मूलभूत अंतर है जिसे दूर करना आसान नहीं है। क्योटो जैसा वाराणसी को बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कई चुनौतियों को ध्यान रखना होगा।
काशी को क्योटो बनाने में चुनौतियां 1-5
1-भौगोलिक बनावट-क्योटो शहर पर्वतीय तलहटी में तीन नदियों के बेसिन में है जहां भौगोलिक कारणों से सड़कों पर जल जमाव जैसा संकट नहीं होता है जबकि वाराणसी शहर में जल निकासी व सीवर सबसे गंभीर समस्या है। यहां हल्की सी बारिश में सड़कें जलमग्न हो जाती हैं।
2-आबादी-क्योटो शहर साठ साल पहले जापान का आबादी के लिहाज से सबसे बड़ा शहर था लेकिन आबादी के धीमे विस्तार के कारण वह आज नवें स्थान पर पहुंच चुका है। वाराणसी शहर में ठीक इसके उलटे पिछले दो दशक में आबादी दो गुना हो गई है। यहां शहरी योजना से भी तेजी से हो रही बसावट के चलते आधा शहर ही अनधिकृत रुप से बस चुका है।
3-क्योटो को वर्ष 1994 में वर्ल्ड हेरिटेज शहर का दर्जा मिल चुका है। यह जापान का सबसे बेहतर संरक्षित शहर है। वाराणसी में पुराने भवनों व स्थापत्य के संरक्षण के लिए न के बराबर काम हुआ है। प्रसिद्ध गंगा घाट भी लगातार अतिक्रमण के चलते अपना स्वरूप बदलते जा रहे हैं। ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए जरुरी धन का संकट अलग समस्या है।
4-कलात्मक भवनों के साथ ही क्योटो को बगीचों का भी शहर कहा जाता है। वाराणसी में पार्क व बगीचों अलबत्ता तो हैं नहीं। जो हैं भी उनका रख-रखाव बहुत खराब है।
5-क्योटो ने पुराने शहर को संरक्षित करने के साथ ही विकासात्मक गतिविधियों के लिए अलग से आधुनिक शहर भी बसाया है। जहां नये तरह के भवन व जरूरी निर्माण कराये गये हैं। वाराणसी में इसका नितांत अभाव है। नई शहरी आबादी की बसावट के लिए कोई योजनागत विकास नहीं है।
काशी को क्योटो बनाने में चुनौतियां 6-9
6-आर्थिक पक्ष देखें तो भी वाराणसी क्योटो के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता है। क्योटो जापान फिल्म निर्माण का प्रमुख केंद्र होने के साथ ही आईटी हब के रूप में भी जाना जाता है। टूरिज्म का बड़ा केंद्र तो है ही। यहां हर साल तीन करोड़ टूरिस्ट आते हैं। क्राफ्ट का भी यह प्रमुख केंद्र है। इसकी तुलना में वाराणसी धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र तो है लेकिन अन्य आर्थिक गतिविधयों के मामले में बहुत पीछे हैं। यहां स्थानीय क्राफ्ट वाराणसी साड़ी तथा कालीन उद्योग भी संकट में है।
7-क्योटो में अपना एयरपोर्ट नहीं है लेकिन बुलेट ट्रेन के नेटवर्क से जुड़ा होने के कारण देश के किसी भी हिस्से में आना जाना आसान है। वाराणसी शहर इस मामले में भी पीछे हैं। यहां अभी तक राजधानी अथवा शताब्दी जैसे ट्रेनों की भी सुविधा नहीं उपलब्ध है।
8-आंतरिक ट्रांसपोर्ट के मामले में भी वाराणसी की खस्ताहाल सड़कें, सिटी बस सेवा का क्योटो से कोई मुकाबला नहीं है। जापानी शहर क्योटो में स्थानीय लोग साइकिल से चलना पसंद करते हैं। वहां जगह जगह साइकिलों के लिए पार्किंग का इंतजाम है। शहर में साइकिल चोरी की कोई घटना मुश्किल से सुनने को मिलती है। वाराणसी में साइकिल चलाने के लिए अलग से कोई पाथ अथवा पार्किग नहीं है। साइकिलों की सुरक्षा यहां अलग मुद्दा है।
9-वाराणसी में आर्ट गैलरी तथा म्यूजियम का नितांत अभाव है जबकि क्योटो में 32 म्यूजियम तथा आर्ट गैलरी है।