नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल ने यमुना नदी में फूलमाला समेत पूजन सामग्री प्रवाहित करने पर 5,000 रुपए का जुर्माना तय कर दिया है। एनजीटी के नए आदेश में यमुना नदी में निर्माण सामग्री डालने पर 50 हजार रुपए जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
यमुना की हालत मद्देनजर एनजीटी का आदेश वाकई सराहनीय है। फिर भी सवाल यह है कि आदेश का अनुपालन कैसे सुनिश्चित किया जाएगा? ये कैसे तय हो पाएगा कि यमुना में एक भी व्यक्ति मालाफूल या अन्य किसी प्रकार की पूजा सामग्री न डाले?
यमुना नदी में रोजाना 2,400 मिलियन लीटर सीवेज बिना उपचारित किए गिरता है। एक आंकड़े के मुताबिक दिल्ली से ही रोजाना 1,900 मिलियन लीटर सीवेज यमुना में गिराया जाता है। केंद्र सरकार यमुना की सफाई पर लगभग 500 मिलियन डॉलर खर्च कर चुकी है। नतीजे की क्या रहे हैं, इसकी गवाही यमुना ही कर देती है।
एनजीटी के नए आदेश के बाद भी संशय बरकरार रहता है कि शायद ही यमुना की हालत में सुधार हो। संशय का कारण चंद सवाल हैं, आप भी जानिए उन सवालों को-
(नोटः फोटो सोशल मीडिया से ली गई है।)
पूजा सामग्री प्रवाहित करने से कैसे रोक पाएंगे?
यमुना में पूजन सामग्री प्रवाहित करने में सबसे बड़ी भूमिका मंदिरों और श्रद्घालुओं की है। यमुना उत्तराखंड, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से में बहती है।
इलाहाबाद में गंगा से संगम होने तक यमुना के किनारे कई ऐसे मंदिर बने हैं, जिनसे नदी में भारी मात्रा में पूजा सामग्री बहाई जाती है। शहरों और गांवों में तमाम श्रद्घालु पूजा सामग्री प्रवाहित करने के लिए नदी का ही इस्तेमाल करते हें। मेलों और अन्य प्रकार के उत्सवों के कारण भी नदी में काफी मात्रा में ऐसी चीजे बहा दी जाती हैं, जो नुकसानदेह होती हैं।
मूर्तियों का विसर्जन भी प्रदूषण का बड़ा कारण हैं। आदेश के बाद भी एनजीटी के सामने चुनौती यही होगी कि वह पूजा सामग्री और मूर्तियों को का विसर्जन रोकना कैले सुनिश्चित करे।
निर्माण सामग्री न बहे, इसकी कैसे करेंगे निगरानी
एनजीटी ने यमुना में निर्माण सामग्री बहाने पर 50 हजार का जुर्माना तय किया है। यहां भी वही सवाल है कि एनजीटी ये निगरानी कैसे कर पाएगा कि यमुना में निर्माण सामग्री न बहे?
निर्माण सामग्री बहाने में रीयल स्टेट डेवलपर्स से अधिक भूमिका उन मकानों की है, जो आम आदमी अपने लिए बनवाता है। शहरों में निर्माण का कचरा आम तौर पर नदियों में डाल दिया जाता है।
केंद्र सरकार ने यमुना के किनारे के सिवेज सिस्टम और नालों को ठीक करने के लिए कई प्रयास किए। यमुना एक्शन प्लान जैसी योजना बनाई गई। करोड़ों रुपए भी खर्च किए गए। फिर भी यमुना का प्रदूषण नहीं रोका जा सका।
निर्माण साम्रग्रियों का प्रवाह रोकने का मसला भी योजनाओं के क्रियान्वयन से ही जुड़ा है। एनजीटी ने आदेश तो दिए है, लेकिन उसके अनुपालन के लिए क्या योजना बनाई जाएगी, इसका इंतजार रहेगा।
यमुना के किनारे कैसे रोकेंगे मकानों का निर्माण
गंगा के किनारे मकानों के निर्माण पर सालों से रोक लगी हुई है। लेकिन नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों की मिलीभगत से गंगा के किनारे मकानों का निर्माण धड़ल्ले से किया जा रहा है। एनजीटी ने अब यमुना के किनारे मकानों का निर्माण न करने का आदेश दिया है।
सवाल यह है कि प्रशासन की लापरवाही के कारण ही गंगा के किनारे मकानों का निर्माण नहीं रुक पाया, फिर यमुना के किनारे मकानों का निर्माण रुक जाएगा, इसकी क्या गारंटी है।
नदियों के किनारे मकान निर्माण न रोकपान में प्रशासन के भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार की बहुत बड़ी भूमिका है। वही प्रशासन यमुना के किनारे निर्माण कैसे रोक पाएगा।