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अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने की मोदी सरकार की आलोचना

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अपने हर भाषण में आमतौर पर मोदी इस बात का जिक्र जरूर करते हैं कि पूरी दुनिया हमारी तरफ देख रही है, शायद उनकी बात सही भी है और अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार द न्यूयार्क टाइम्स के संपादकीय को देखकर इस बात का अंदाजा भी हो जाता है। और अगर अखबार के इशारों पर गौर करें तो यह अच्छे संदेश नहीं है।
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जेएनयू के मुद्दे पर घिरी मोदी सरकार को अभी तक घरेलू मोर्च पर ही आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा था लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह मुद्दा चर्चा में आ गया है। अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार द न्यूयार्क टाइम्स ने इस पूरे मुद्दे पर संपादकीय लिख कर मोदी सरकार को नसीहत दी है।

India’s Crackdown on Dissent शीर्षक से लिखे गए चुभते हुए संपादकीय में जेएनयू मुद्दे पर छात्रों के साथ किए गए व्यवहार और उनकी अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रहार करने पर सरकार की आलोचना की गई है।
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कन्हैया की गिरफ्तारी से संसद में घिर सकती है सरकार

मोदी सरकार के सत्तावादी बहाव की अखबार ने सीधे तौर पर आलोचना की गई है। अखबार इशारा करता है कि जेएनयू मुद्दे पर सरकार ने कन्हैया कुमार पर जिस तरह की कार्रवाई की है उससे मोदी सरकार के संसद में उसके आर्थिक सुधारों के अभियान को भी झटका लग सकता है।

इससे पूर्व भी अखबार ने दिल्‍ली में जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तारी के बाद इस मुद्दे पर अलग से एक लेख लिखा था। जिसमें कहा था कि अंध देशभक्ति के नाम पर इस देश में हिंसा भी स्वीकार्य है।

भीड़ की इस न्याय करने की मानसिकता के पीछे मोदी सरकार की सहमति निहित है। अखबार ने केवल प्रधानमंत्री मोदी की ही आलोचना नहीं की है बल्कि उनके मंत्रियों को भी कटघरे में खड़ा किया है।
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फ्रांस के अखबार ने भी मोदी सरकार को निशाने पर लिया

अखबार ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह के उस बयान का भी संदर्भ दिया है जिसमें उन्होंने जेएनयू में देश विरोधी नारों के बाद कहा था कि अगर कोई देश विरोधी नारे लगाता है और देश की अखंडता पर सवाल खड़े करता है तो उसे बख्‍शा नहीं जाएगा।

अखबार के अनुसार सिंह यह नहीं समझ सके हैं कि लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करना एक अधिकार है कोई अपराध नहीं।

इसके अलावा फ्रांस के प्रमुख दैनिक अखबार ली मांडे ने भी जेएनयू मुद्दे पर हाल ही में एक लेख प्रकाशित किया। 'भारत के लोकतंत्र के ‌क्षितिज अजीत तरह से घिरे' शीर्षक से प्रकाशित संपादकीय में जेएनयू छात्र और डीयू के पूर्व प्रोफेसर की गिरफ्तारी को एक हिंदू राष्ट्रवादी सरकार के अधिनायकवादी बहाव के चित्रण के तौर पर पेश किया गया है।
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