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नई शिक्षा नीति फाइनल करने से पहले संघ की राय लेगी सरकार

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नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे पर देशव्यापी विचार-विमर्श का दौर पूरा होने के बाद सरकार अब अंतिम चरण में संघ की राय लेगी।
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शिक्षा व्यवस्था में सुधार के कदम को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद भगवा शिक्षण संस्थानों के प्रधानाचार्यों के साथ सार्वजनिक चर्चा करेंगे, तो मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी विद्या भारती के सैकड़ों स्कूलों से सीधा संवाद करेंगी।

इस कवायद में शिक्षा क्षेत्र में कार्य करने वाली संघ की संस्था विद्या भारती ने अपना तीन दिवसीय (11 से 13 फरवरी तक) राष्ट्रीय सम्मेलन दिल्ली में रखा है।
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संघ के एक शीर्ष अधिकारी के अनुसार पीएम मोदी 12 फरवरी को विज्ञान भवन में आयोजित कार्यक्रम में विद्या भारती के स्कूलों को प्रधानाचार्यों से सार्वजनिक रूप से मुखातिब होंगे। यह पहला मौका होगा जब शिक्षा नीति से जुड़े किसी कार्यक्रम में प्रधानमंत्री सार्वजनिक तौर पर भाग लेंगे।

स्मृति ईरानी अलग से इन प्रधानाचार्यों के साथ राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर अंतिम मंत्रणा करेंगी। गौरतलब है कि बीते साल नई सरकार बनने के बाद से ही संघ की ओर से शिक्षा में नैतिक मूल्यों और राष्ट्रवाद के समावेश को लेकर प्रयास किए जा रहे हैं।

सम्मेलन में देश के 527 जिलों में विद्या भारती के अंतर्गत चलने वाले 700 सेकेंडरी स्कूलों के प्रधानाचार्य उपस्थित रहेंगे। इसके अलावा सीबीएसई, एनसीईआरटी और आईसीएससी सरीखे तमाम संस्थानों के अधिकारी और शिक्षाविद् भी सम्मेलन में आएंगे।

बताया जा रहा है कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा फरवरी अंत तक तैयार हो जाएगा। विद्या भारती देश में 36 हजार से ज्यादा स्कूल चलाती है।
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नई शिक्षा नीति आने के बाद डिग्री बेचने वाले संस्थानों के लदेंगे दिन

नई शिक्षा नीति-2015 के लागू होने के बाद देश में फैली डिग्री बेचने वाली दुकानों के दिन लद जाएंगे। शिक्षा नीति को तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष और पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम ने कहा कि यह नीति अगले 30-40 साल तक शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होगी।

पूर्व कैबिनेट सचिव के अनुसार समिति इसका ड्राफ्ट फरवरी के अंतिम सप्ताह में सरकार को सौंप देगी और हमें विश्वास है कि इसके अमल में आने के बाद शिक्षा के क्षेत्र व्यापक गुणात्मक बदलाव आएगा।

अमर उजाला से बातचीत में सुब्रमण्यम ने कहा कि देश में पहली शिक्षा नीति 1986 में बनी थी। 1992 में इसमें कुछ संशोधन किए गए थे।

इस दौरान शिक्षा में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक बदलाव हुए है। तमाम नए पाठ्यक्रम, नई परीक्षा पद्धति और मूल्यांकन के तरीके आए हैं। रोजगार के क्षेत्र में मानव जरूरतों की प्रकृति बदली है।

इसलिए नई शिक्षा नीति अपरिहार्य थी। देश में छात्रों को मिल रही तमाम डिग्री आज के लिए प्रासंगिक नहीं है। तमाम शिक्षण संस्थान डिग्री बेचने वाली दुकान के रूप में चल रहे हैं। इन सभी को ध्यान में रखकर यह शिक्षा नीति तैयार की जा रही है।

टीएसआर के मुताबिक स्कूली शिक्षा के दौरान सबसे बड़ी समस्या लड़कियों के बीच में पढ़ाई छोड़ने की है। दूसरे, शिक्षक भी स्कूलों में कम रुचि ले रहे हैं।

इसके चलते स्कूली शिक्षा(प्राइमरी) से लेकर माध्यमिक स्कूलों में गुणवत्ता का स्तर काफी कमजोर है। साथ ही तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा में तमाम विसंगतियां सामने आई हैं। सुब्रमण्यम के अनुसार इन सभी मुद्दों पर व्यापक विमर्श करके नीति तैयार की जा रही है।
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