नेपाल में विनाशकारी भूकंप के बाद चलाया जा रहा राहत और बचाव अभियान नाकाफी साबित हो रहा और इससे लोगों के अंदर भारी गुस्सा है। मरने वालों की तादाद 6000 के पार पहुंच चुकी है और अभी भी कई इलाके ऐसे हैं जहां मदद नहीं पहुंच पा रही है। भोजन, पानी, दवा की भारी किल्लत है और असंतुष्ट लोग सड़कों पर उतर आए हैं।
विज्ञापन
नेपाली प्रधानमंत्री सुशील कोइराला ने बुधवार को जब कुछ राहत शिविरों का जायजा लेना चाहा तो उन्हें लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा। शिविर में रह रहे लोगों का कहना था कि उन्हें कोई मदद नहीं मिल रही है। दोलखा जिले में भूकंप पीड़ितों ने न केवल सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया, बल्कि जिला प्रशासन के दफ्तर में तोड़फोड़ और आगजनी की। भूकंप से बर्बादी के बाद लोगों का यहां से अपने स्थायी घरों को लौटने का सिलसिला तेज हो गया है।
अब तक 3 लाख 40 हजार लोग काठमांडू छोड़ चुके हैं। इस बीच, मलबों और ध्वस्त इमारतों से 6000 लाशें निकाली जा चुकी हैं। मंगलवार को प्रधानमंत्री कोइराला ने खुद कहा था कि मरने वालों की तादाद 10,000 तक पहुंच सकती हैं क्योंकि दूर-दराज के इलाकों से सूचनाएं नहीं मिल रही हैं। घायलों की तादाद 11,000 से पार पहुंच चुकी है।
विज्ञापन
खुले आसमान के नीचे समय बीता रहे भूकंप पीड़ित अपने देश की सरकार को कोस रहे हैं। नाराज प्रदर्शनकारियों ने ‘ऐसी सरकार नहीं चाहिए, गृह मंत्री इस्तीफा दो’ के नारे लगाए। दोलखा जिले के भूकंप पीड़ितों ने तिरपाल, खाद्य सामग्री, पानी नहीं मिलने पर बुधवार को जिला प्रशासन दफ्तर में तोड़फोड़ की।
गुस्साए लोगों ने सरकारी दफ्तरों में की तोड़फोड़
भूकंप पीड़ितों ने दफ्तर के फर्नीचर और अन्य सरकारी सामग्रियों में आग लगा दी। मुख्य जिला अधिकारी प्रेमलाल लामिछाने ने ‘अमर उजाला’ को फोन पर बताया कि केंद्र से फिलहाल राहत सामग्री उपलब्ध नहीं कराई गई है। इस कारण भूकंप पीड़ितों के बीच वितरित नहीं हो पाई है।
नेपाल के विभिन्न गांवों से राहत सामग्री लेने के लिए पीड़ित जिला मुख्यालय पहुंच रहे हैं। जिला मुख्यालय में उन्हें राहत नहीं मिल रही है। खाना, पानी और दवाइयों की भारी कमी हो गई है और कई जगहों पर इन्हें लूटने के दौड़े लोगों और पुलिस के बीच झड़पों की खबरें हैं। लोग काठमांडू से बाहर जाने के लिए बस स्टेशनों पर खड़े हैं लेकिन बसें नहीं पहुंच रही हैं।
स्टेशनों में लोगों के बीच धक्का-मुक्की देखने को मिल रही है और हालात काबू करने के लिए दंगा नियंत्रण पुलिस को बुलाना पड़ रहा है। भूकंप पीड़ितों की राहत के लिए विभिन्न देशों से मदद आने के बावजूद नेपाल सरकार चुस्त व्यवस्था और वितरण नहीं कर सकी है। देश भर से दान की गई राहत सामग्री भी पीड़ितों तक नहीं पहुंची।
सरकारी तंत्र में राहत वितरण को लेकर समन्वय की कमी है। सरकार के प्रवक्ता मिनेंद्र रिजालने जल्द वितरण व्यवस्था ठीक कर लेने का दावा किया। नेपाल में अभी तक भारत, चीन, अमेरिका, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, जापान, डेनमार्क सहित दर्जन से अधिक देशों से राहत सामग्री आ रही है।
दूर-दराज के इलाकों में राहत नहीं
नेपाल में चल रहा राहत और बचाव अभियान देश के दूर-दराज के इलाकों तक नहीं पहुंच सका है। पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन से रास्ते बंद हो गए हैं और राहत टीमों के लिए सुदूर इलाकों के भूकंप प्रभावितों तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है। सरकारी प्रवक्ता का कहना है कि इन इलाकों में हेलीकॉप्टर से सूखा राशन, टेंट और दवाइयां गिराई जा रही हैं लेकिन यह दूर-दूर छितराए गांवों तक नहीं पहुंच पा रही हैं।
भारत का ध्यान काठमांडू और गोरखा जिले पर भारत के राहत और बचाव अभियान का सबसे ज्यादा जोर काठमांडू और गोरखा जिले में है। नेपाल में भारत के राजदूत रंजीत राय के मुताबिक फिलहाल पूरा फोकस काठमांडू और भूकंप के केंद्र गोरखा जिले पर है। राय बुधवार को नेपाल के उप प्रधानमंत्री बाम देव गौतम के साथ काठमांडू में ध्वस्त हुई एक छह मंजिला इमारत को जायजा लेने गए। एनडीआरएफ की टीम ने इस इमारत से 10 लाशें निकाली। इस वक्त एनडीआरएफ के 500 कर्मी नेपाल के राहत अभियान में लगे हैं।
मिट गई काठमांडू की पहचान विनाशकारी भूकंप ने काठमांडू की पहचान ही मिटा दी है। पांच सौ साल पुराने जिस काष्ठमंडप मंदिर पर राजधानी का नाम काठमांडू पड़ा है वह अब सिर्फ मलबे का ढेर रह गया है। भूकंप ने मंदिर में मौजूद कई लोगों को मौत की नींद सुला दी। काठमांडू में जिस दिन भूकंप आया उस दिन कई लोग मंदिर के अंदर रक्तदान के लिए जमा हुए थे। लेकिन एक ही झटके में सारे लोग दब गए।
रक्तदान कर रहे कुछ लोगों ने अपने हाथ से सूई हटा कर बाहर भागने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे। कुछ लोग यह सोच कर मंदिर के अंदर भागे थे कि अब तक कई भूकंपों को झेल चुका यह मंदिर अब भी बचा ही रहेगा। यहां राहत कार्य में लगी सुनीति तमराकर ने बताया कि मंदिर के मलबे में दबी कई नर्सों की लाशों को जब बाहर निकाला गया तो वे हाथ जोड़े थीं।
संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि नेपाल के लोगों के लिए तुरंत राहत पहुंचाने के लिए 41.50 करोड़ डॉलर (लगभग 2500 करोड़ रुपये) की जरूरत है। नेपाल के लोगों को अगले तीन महीने के लिए आश्रय, पानी, भोजन और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से 41.50 करोड़ डॉलर की सहायता की जरूरत होगी। लोगों को भोजन मुहैया कराने के लिए ही 12.80 करोड़ डॉलर खर्च करने होंगे।
पेशाब पीकर जिंदा रहा 82 घंटे नेपाल में भूकंप से ध्वस्त हुए एक होटल के दबा एक शख्स अपना ही पेशाब पीकर 82 घंटों तक मौत से जूझता रहा। आखिरकार उसकी हिम्मत काम आई और इमारत की दीवार को ठोकने की आवाज एक फ्रांसीसी राहतकर्मी ने सुन ली और उसे निकाल लिया गया। काठमांडू के एक होटल के एक मलबे में दबे 27 वर्षीय ऋषि खनल ने बताया कि शनिवार को दोपहर का भोजन करने के बाद जैसी ही उसने दूसरी मंजिल की ओर रुख किया इमारत भरभरा कर गिर गई।
खनल इसमें फंस कर जिंदगी के छटपटाते रहे। खनल ने बताया, ‘शुरू में मुझे बचने की थोड़ी उम्मीद थी लेकिन मंगलवार तक मैंने यह छोड़ दी थी। मेरे नाखून सफेद हो गए थे और मेरे होठ बुरी तरह फट चुके थे। मुझे लगा कि अब मुझे कोई बचाने वाला नहीं। मेरी मौत निश्चित है।
फिर भी मैंने हिम्मत बनाए रखी और आखिरकार एक फ्रांसीसी टीम को दीवार पर धक्का मारने की आवाज सुनाई दे गई। उसने मुझे निकाला। इस दौरान बचे रहने के लिए मुझे अपना ही पेशाब पीना पड़ा। बाहर आने के बाद खनल ने कहा कि जिंदा रहना अच्छा लग रहा है।
परिवार के 18 सदस्यों को एक साथ आखिरी विदाई काठमांडू की पवित्र नदी बागमती के किनारे अपनी बेटी की चिता को आग दे रहे शंकर प्रधान को अपने परिवार के 18 सदस्यों को एक साथ इस भूकंप में गंवाना पड़ा है। प्रधान पर दुखों को पहाड़ टूट पड़ा है। चिता में सजी अपनी बेटी के पैर और होठों को वह तीन बार पानी में डुबोते हैं ताकि उसकी आत्मा को मुक्ति मिले।
बेटी की चिता पर लकड़ी सजाते प्रधान की आंखों में आंसू हैं और वह टूटे दिल से अपने परिवार को 18 सदस्यों को आखिरी विदाई दे रहे हैं। शनिवार के भूकंप में उनके भाई का चार मंजिला मकान ढह गया था और उनके परिवार के 18 सदस्य मौत के मुंह में समा गए थे।