बात उन दिनों की है जब देश को आज़ाद हुए महज दस साल हुए थे और जवाहर लाल नेहरू की लोकप्रियता शिखर पर थी। नेहरू उत्तर प्रदेश के फूलपुर संसदीय क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ते थे।
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1952 में हुए देश के पहले आम चुनाव में नेहरू वहीं से चुनाव जीतकर सांसद बने थे। इलहाबाद जिले का यह संसदीय क्षेत्र हर लिहाज से नेहरू के मुफीद था। उन्हें यहां कोई चुनौती नहीं थी।
लेकिन जब 1957 में दूसरा आम चुनाव हो रहा था तो समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने यह कहकर राजनीति में हड़कंप मचा दिया कि इस बार वह फूलपुर से चुनाव लड़ेंगे।
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राजनीतिक मतभेद नहीं रोक सका संवाद
राजनीति में एक दूसरे के विचारों से असहमत होते हुए भी नेहरु और लोहिया के बीच निरंतर संवाद होता था। जर्मनी से अपनी शिक्षा पूरी करके लोहिया जब भारत लौटे और स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में वह कांग्रेस में शामिल हुए तो नेहरू के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित थे।
नेहरू के साथ मिलकर उन्होंने कांग्रेस के भीतर समाजवादी सोच वाले नेताओं के समूह को मिलाकर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सीएसपी) के गठन में अहम भूमिका निभाई।
लेकिन बाद में नेहरू से उनके मतभेद गहराए और लोहिया और अन्य समाजवादी सोच के नेताओं ने कांग्रेस से अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया।
मित्र लोहिया को भेजा पत्र
अपने खिलाफ चुनाव लडऩे के लोहिया के ऐलान के बाद जवाहर लाल नेहरू ने लोहिया को निजी पत्र लिखा। यह पत्र प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा नहीं बल्कि लोहिया के मित्र और चुनावी प्रतिद्वंदी नेहरू द्वारा भेजा गया था।
जिस पर प्रधानमंत्री कार्यालय की सील व लिफाफा नहीं था। नेहरू ने लिखा कि प्रिय राम मनोहर खबर मिली है कि तुम मेरे खिलाफ फूलपुर से चुनाव लडऩे जा रहे हो। उम्मीद है कि मुकाबला अच्छा होगा और राजनीति की मर्यादा बनी रहेगी। मैं वादा करता हूं कि नामांकन के बाद प्रचार के लिए फूलपुर नहीं आउंगा।
इसके बाद नेहरू फूलपुर आए और नामांकन करके देश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार के लिए निकल गए। उधर लोहिया नामांकन के बाद फूलपुर में गांव-गांव घूमने लगे।
लोहिया के जोशीले भाषण ने बदला माहौल
उनकी नुक्कड़ सभाओं में पहले कम लोग जुटते थे, लेकिन धीरे धीरे भीड़ बढऩे लगी। देश भर के समाजवादी कार्यकर्ता लोहिया के चुनाव प्रचार के लिए चना चबेना लेकर कंधे पर झोला टांग कर फूलपुर में घूमने लगे।
जैसे-जैस मतदान की तारीख नज़दीक आने लगी लोहिया का चुनाव प्रचार और लोकप्रियता बढऩे लगी। लोग दूर-दूर से लोहिया के जोशीले भाषण को सुनने आने लगे।
वह अपने भाषण में कांग्रेस सरकार और नेहरू की नीतियों को गांव, गरीब और देश की जमीनी हकीकत के खिलाफ बताते थे, उन्हें सुनकर माहौल बदलने लगा।
आधुनिक सुविधाओं से दूर था चुनाव प्रचार
लोहिया हर सुबह प्रचार के लिए निकलते। गांव-कस्बों में जाते। धुआंधार चुनावी सभाएं, नुक्कड़ बैठके और पदयात्रा के जरिए सघन जनसंपर्क करते। जहां रात हो जाती वहीं रुक जाते और अगली सुबह फिर निकल पड़ते।
लोहिया के इस तूफानी प्रचार से ऐसा लगने लगा कि कहीं फूलपुर का फिजां न बदल जाए और नेहरू का अति आत्मविश्वास उन्हें भारी न पड़ जाए।
उन दिनों न टीवी था, न मोबाइल फोन थे। लैंड लाइन फोन भी कम ही होते थे और बमुश्किल से लाईन मिलती थी। चुनाव प्रचार झंडों, पोस्टरों, बैनरों और बिल्लों से होता था। देर रात तक सभाएं और जनसंपर्क चलता था।
नेहरू के चुनाव प्रबंधकों और स्थानीय कांग्रेस नेताओं ने दिल्ली जाकर उन्हें बताया कि अगर चुनाव जीतना है तो फूलपुर आना पड़ेगा। पहले नेहरू तैयार नहीं हुए लेकिन जब खुफिया विभाग की भी यही रिपोर्ट आई कि अगर हालात नहीं संभाले गए तो चुनाव हार भी सकते हैं।
इसके बाद नेहरू फूलपुर गए और कई दिनों तक लगातार उन्होंने चुनावी सभाएं और चुनाव प्रचार किया। तब मतदान के दिन तक नेहरू स्थिति संभाल पाए और नतीजा उनके हक में गया।
लेकिन लोहिया ने कहा कि उन्होंने नेहरू के इस गरुर को तोडऩे में कामयाबी हासिल की कि वह बिना फूलपुर आए चुनाव जीत जाएंगे, यही उनकी जीत है।