पश्चिम बंगाल के जंगलमहल इलाके में पिछले एक साल से ज्यादा समय से शांति का माहौल बना हुआ था, लेकिन अब फिर से इस क्षेत्र में नक्सली गतिविधियां बढ़ने लगी हैं। नक्सली नेता किशनजी के मारे जाने और अन्य पदाधिकारियों के गिरफ्तार होने के बाद यहां नक्सल प्रभाव कम हो गया था।
पश्चिमी मेदिनीपुर, बांकुरा और पुरुलिय जंगलमहल के अंतर्गत आते हैं। यहां अक्सर नक्सलियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच मुठभेड़ होती रहती थी, लेकिन 2011 के मध्य से यहां शांति बनी हुई है। राज्य के खुफिया ब्यूरो के मुताबिक, माओवादी इलाके में एक बार फिर सक्रिय हो गए हैं। उन्होंने खुद को संगठित करना शुरू कर दिया है।
प्रदेश खुफिया ब्यूरो के अतिरिक्त महानिदेशक बानीब्रत बासु ने कहा, ‘हमारे पास खास जानकारी है कि नक्सली इस क्षेत्र में फिर से अपने पैर पसार रहे हैं। पश्चिमी मेदिनीपुर के लालगढ़ इलाके में विकास, पुरुलिया की अयोध्या पहाड़ियों में रंजीत, जामबानी में मदन महतो, आकाश और जयंतो एक बार फिर से नये लोगों को संगठित करने की कोशिश में लगे हैं।’
नक्सलियों द्वारा बार बार इस इलाके को चुनने की वजह यहां की भौगोलिक संरचना है। घने जंगल और पहाड़ी इलाका होने के कारण उनकी भूमिगत गतिविधियों के लिए यह आदर्श स्थान बन जाता है। इलाके में लंबे समय से शोषण के शिकार रहे आदिवासी लोगों का होना भी उनके फायदे की वजह बनता है। नौकरी की उपलब्धता और बुनियादी ढांचे के लिहाज से यह इलाका अल्पविकसित है। 2010-11 में यहां 350 हत्याएं हुईं, वहीं 2012 में हत्या का एक भी मामला सामने नहीं आया।
सूत्रों के मुताबिक, माओवादी कमांडर विकास की पत्नी तारा, मदन की पत्नी जबा और जयंतो आंदोलन को फिर से जीवित करने में लगे हैं। पश्चिमी रेंज के पुलिस महानिरीक्षक गंगेश्वर सिंह ने कहा कि हम हर तरह की स्थिति से निबटने को तैयार हैं।
हालिया गतिविधियों पर नक्सली विचारक वरवरा राव ने कहा, ‘यह किसी भी सशस्त्र आंदोलन की स्वाभाविक प्रक्रिया है। अगर जंगलमहल इलाके के लोगों से किए गए वादे पूरे नहीं किए जाते हैं तो इलाके के लोग विद्रोह के लिए फिर से उठेंगे।’ माकपा नेता और पूर्व नक्सली संतोष राणा ने कहा कि इस नक्सली आंदोलन की कोई विचारधारा नहीं है और गरीब आदिवासियों को मारने का एकमात्र उद्देश्य यही है कि जंगलमहल में माकपा को कमजोर किया जाए।