फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बलात्कार मामला: सूचना देने में गंभीर नहीं राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो

Sat, 20 Oct 2012 08:20 PM IST
पीयूष पांडेय/नई दिल्ली
विज्ञापन
विज्ञापन
सरकार और उसके विभाग बलात्कार के बढ़ते मामलों पर अंकुश लगाने ही नहीं, बल्कि ऐसे मामलों सूचना देने के प्रति भी संजीदा नहीं हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से आरटीआई के तहत मांगी गई सूचना के जवाब में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने कहा है कि बालिग लड़कियों के साथ हुई घटनाओं के आंकड़े एकत्र ही नहीं किए जाते, जबकि ब्यूरो की वेबसाइट पर ये आंकड़े उपलब्ध हैं। एनसीआरबी ने अपने जवाब की खानापूर्ति में नाबालिग लड़कियों के साथ हुई घटनाओं का ब्यौरा दिया है।
विज्ञापन


बलात्कार की घटनाओं के आंकड़ों की जानकारी और उसके निपटारे की स्थिति जानने के लिए आरटीआई कार्यकर्ता गौरव अग्रवाल ने सूचना के अधिकार का प्रयोग किया था। उत्तर प्रदेश के हाथरस के रहने वाले अग्रवाल की आरटीआई का जवाब तो दिया गया, लेकिन जवाब देखकर वह चकित रह गए कि एनसीआरबी के पास बालिग लड़कियों के साथ होने वाली बलात्कार की घटनाओं का आंकड़ा नहीं है।

आरटीआई कार्यकर्ता की ओर से 2007 से 2010 तक की सूचना मांगी गयी थी। जवाब में अपराध ब्यूरो ने सूचित किया कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से आरटीआई को उनके पास भेजा दिया गया। साथ ही स्पष्ट किया कि ब्यूरो में अल्प वयस्क लड़कियों के साथ हुई बलात्कार के दर्ज मामलों के आंकड़े एकत्र किए जाते हैं, लेकिन वयस्क लड़कियों के साथ हुई ऐसी घटनाओं की सूचना एकत्र नहीं की जाती।
विज्ञापन


ब्यूरो ने जवाब में बलात्कार से पीड़ित कितनी लड़कियां जीवित हैं या उनकी मौत हो गई है। इस बारे में भी सूचना एकत्र नहीं की जाती। जबकि एनएसआबी की वेबासइट पर देशभर में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत हुए बलात्कार के अपराध के आंकड़े मौजूद हैं।

वेबसाइट में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक 2007 में 20737, 2008 में 21467, 2009 में 21397, 2010 में 22172 और 2011 में 24206 बलात्कार के मामले सामने आए हैं। आरटीआई के जवाब में ब्यूरो ने नाबालिग लड़कियों से साथ हुई घटनाओं के आंकड़े दिए जिसमें बताया गया कि देशभर में 2007 में 6136, 2008 में 7960, 2009 में 7461 और 2010 में 6272 मामले सामने आए। इन मामलों में 2007 में 575, 2008 में 843, 2009 में 1227 और 2010 में 906 मामले झूठे पाए गए।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें