आजाद भारत के इतिहास में पहली बार देश में गांधी जयंती कुछ अलग तरह से मनाई गई।
भारत आजाद होने के 68 साल बाद कोई कांग्रेसी पीएम महात्मा गांधी को ऐसा सम्मान नहीं दे पाया, जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी की जयंती को राष्ट्रीय उत्सव में बदल कर दिया।
महात्मा गांधी को कांग्रेस अपनी विरासत का सबसे बड़ा हिस्सा मानती है। कांग्रेस ने 2007 में महात्मा गांधी के सम्मान में सत्याग्रह शताब्दी समारोह को मनाया था।
मगर ये कार्यक्रम पार्टी और सरकार का एक महज कार्यक्रम बन कर ही रह गया। लोगों को सीधे जोड़ने और आज के युवा व बच्चों को इसके बारे में बताने का काम कांग्रेस और उनकी सरकारें नहीं कर सकी।
कांग्रेस में फैली बेचैनी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शायद कांग्रेस की इस चूक को ही अपना हथियार बनाते हुए महात्मा गांधी की विरासत से खुद को जोड़ने का तगड़ा अभियान चला दिया है।
बापू की जयंती पर सुबह सात बजे राजघाट पर राष्ट्राध्यक्षों और बड़ी राजनीतिक शख्सियतों के पुष्पांजलि देने और अखबारों में उनकी फोटो के विज्ञापनों के अलावा सरकारी दिनचर्या में कुछ और ज्यादा नहीं रहता था।
बृहस्पतिवार को भी 24 अकबर रोड के कांग्रेस मुख्यालय के दफ्तर के मुख्य द्वार में राष्ट्रपिता की एक तस्वीर फूलों और जली अगरबत्ती के साथ टेबल पर पड़ी हुई थी। पूरे मुख्यालय में सन्नाटा पसरा हुआ था।
कांग्रेस के कई नेता सालों से आरएसएस और उसको समर्थन करने वाली भाजपा पर महात्मा गांधी की हत्या करने का आरोप लगाते रहे हैं।
कांग्रेस और उनकी सरकार पर उठे सवाल
चुनावों से पहले इस मुद्दे पर कई बार बहस भी हुई। मगर मोदी के गांधी जयंती के राष्ट्रीय पर्व को जीवंत करने से पार्टी को बगले झांकने के लिए मजबूर कर दिया है।
बृहस्पतिवार को कांग्रेस के कई नेताओं ने मोदी की इस पहल का स्वागत किया। मगर अभी तक ऐसा क्यों नहीं हुआ? यूपीए सरकार के पिछले दस सालों में ऐसा क्यों नहीं हुआ? इस सवाल पर पार्टी नेताओं के पास कोई जवाब नहीं था।
मगर अंदरखाने इस मामले में हड़कंप मचा हुआ है। कांग्रेस नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने कहा कि सरकार की पहल अच्छी है। अच्छा रहेगा कि प्रधानमंत्री आगे भी इसके प्रति गंभीर रहें।