शहर के आवारा कुत्ते प्रदेश सरकार के लिए चुनौती बन रहे हैं। जिले में हर साल औसतन 60 हजार लोग कुत्ते के काटने के शिकार बनते हैं। इनके लिए सरकार को प्रतिवर्ष ढाई करोड़ से ज्यादा की राशि एंटी रेबीज इंजेक्शन पर खर्च करनी पड़ती है।
पीएल शर्मा जिला अस्पताल और एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज के आंकड़ों के अनुसार प्रतिदिन औसतन दो से ढाई सौ लोग कुत्ते के काटने के शिकार होते हैं। जिला अस्पताल के रजिस्टर के अनुसार 11 जून को 135 लोग, 12 जून को 103, 13 जून को 71, 14 जून को 101, 15 जून को 90 व 16 जून को 73 लोग आवारा कुत्ते के काटने के शिकार हुए। लगभग इतने ही लोग मेडिकल कॉलेज के रजिस्टर में भी दर्ज हैं। डॉक्टरों का कहना है कि प्रत्येक माह औसतन पांच हजार लोग कुत्तों के काटने के शिकार होते हैं। यानी एक साल में लगभग साठ हजार मेरठवासी कुत्तों के आतंक का शिकार बनते हैं।
जिला अस्पताल के डॉ. आरके गुप्ता का कहना है कि लोगों को दस दिनों तक कुत्ते पर नजर रखने की सलाह दी जाती है, लेकिन लोग मानते ही नहीं हैं। दस दिनों के अंदर कुत्ता मर जाता है तो इंजेक्शन लगवाने की जरूरत होती है। बाजारों में एक इंजेक्शन की कीमत लगभग चार सौ रुपये है। इस हिसाब से प्रतिमाह लगभग बीस लाख रुपये के इंजेक्शन लगाए जाते हैं। यानी साल में लगभग ढाई करोड़ रुपये इस मद में खर्च हो जाते हैं।
उन्होंने बताया कि सरकार मुफ्त में इंजेक्शन उपलब्ध कराती है, इसलिए मारामारी लगी रहती है। जिन मरीजों को इंजेक्शन न लगाने की सलाह दी जाती है उनके परिजन मारपीट करने पर उतारू रहते हैं। इसलिए डॉक्टर किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहते हैं।