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राज, उद्धव की 'दुश्मनी' खत्म करेंगे नाना पाटेकर

Fri, 01 Mar 2013 08:12 PM IST
नई दिल्ली/एजेंसी
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बॉलीवुड में अपनी अलग छाप बना चुके नाना पाटेकर ने शिव सेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे और उनके चचेरे भाई राज ठाकरे से आपसी विवाद को भुलाकर साथ आने की अपील की है। नाना ने कहा, ‘मैंने उनसे कहा है कि अलग नहीं रहें और हम सब की भलाई के लिए साथ मिलकर काम करें।’
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शिवसेना सुप्रीमो दिवंगत बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली थी। 62 वर्षीय अभिनेता ने कहा कि वह बाल ठाकरे को पिता समान मानते हैं, लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी पार्टी से उन्हें टिकट नहीं दी। हालांकि नाना पाटेकर ने राजनीति में आने से साफ मना कर दिया।

पाटेकर ने कहा कि उनके एनसीपी प्रमुख शरद पवार और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी दोनों से ही अच्छे संबंध है। उन्होंने कहा, ‘हालांकि मैंने आज तक उन दोनों से ही कोई मदद नहीं मांगी है क्योंकि ऐसा करने से दोस्ती खत्म होने में देर नहीं लगेगी।’
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राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता एक्टर शुक्रवार को रिलीज हुई राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘द अटैक्स ऑफ 26/11’ में संयुक्त पुलिस आयुक्त राकेश मेहरा के किरदार में हैं। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने भी इस फिल्म की तारीफ की है।

इस पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए नाना ने कहा, ‘मुझे खुशी है कि सीनियरों को यह फिल्म पसंद आई। मगर मुद्दे की बात करूं, तो यह एक फिल्म नहीं है। इसमें मनोरंजन के लिए कोई गीत या डांस नहीं है और शायद इसी वजह से मैं इस फिल्म का हिस्सा हूं। यह फिल्म एक संदेश के साथ-साथ अनुभव भी देती है। यह एक ऐसी घटना नहीं है, जिस पर खुश हुआ जा सके। यह एक भयावह हादसा था, जिसे भूल जाना ही अच्छा है।’

उन्होंने फिल्म में मुंबई फिल्म को पाकिस्तानी आतंकियों के आगे बेबस दिखाए जाने की रिपोर्टों को भी खारिज कर दिया।

नाना पाटेकर को अक्सर उनके गुस्से के कारण भी जाना जाता है। नाना ने कहा, ‘हां मुझे जल्दी गुस्सा आ जाता है, इस वजह से मैंने कई रोल भी गंवाए। 'ए वेडनेसडे' में नसीरुद्दीन शाह का रोल पहले मुझे ऑफर किया गया था।’

पाटेकर ने अपने बचपन के संघर्ष को याद करते हुए कहा, ‘मेरे पिता के बिजनेस पार्टनर ने उन्हें धोखा दिया और परिवार के भरण-पोषण का भार मुझ पर आ गया। एक पारसी जेंटलमैन के लिए मैं सिनेमा के पोस्टर पेंट किया करता था, जो मुझे 35 रुपये प्रति माह वेतन और एक वक्त का खाना देते थे। मैं दोपहर तक स्कूल में पढ़ता था और उसके बाद काम करने भाग जाता था। वह बेहद मुश्किल समय था।’
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