फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

भाजपा को जीत दिलाएंगे संघ के मुस्लिम चेहरे!

विज्ञापन
विज्ञापन
आरएसएस की हिंदुत्ववादी सोच के चलते आमतौर पर माना जाता है कि मुस्लिम समुदाय, किसी भी सूरत में संघ और भाजपा की मदद को तैयार नहीं हो सकता है। लेकिन ये पूरी सच्चाई नहीं है।
विज्ञापन


ऐसे कई मुस्लिम चेहरे हैं जो दिल्ली में भाजपा की जीत के लिए जीतोड़ मेहनत कर रहे हैं। संघ की मुस्लिम इकाई मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (एमआरएम) आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राज्य के मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में भाजपा के लिए आक्रामक चुनाव प्रचार कर रही है।

भले ही एमआरएम के किसी भी नेता को औपचारिक तौर पर चुनाव प्रचार की कमान न सौंपी गई हो, लेकिन यह संगठन खुद से ही भाजपा को आगामी चुनावों में जीत दिलाने के लिए अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा है।
विज्ञापन

मोदी के विकास एजेंडे से जोड़ने की कोशिश

एमआरएम के राष्ट्रीय संयोजक मोहम्मद अफजल के मुताबिक उनका संगठन साल 2014 के आम चुनाव की तरह ही इस बार भी मुस्लिम वोटरों तक पार्टी की पहुंच बढ़ाने की कोशिश करेगा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के एजेंडे के सहारे उस वोट बैंक को पार्टी से जोड़ेगा जिसे आमतौर पर कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक माना जाता है।

उन्होंने बताया कि संगठन की महिला स्वयंसेवक घर घर जाकर लोगों को समझाएगी कि वो लोग भाजपा को ही वोट दें। अफजल ने बताया कि हम एक सामाजिक राजनीतिक संगठन हैं और हमारा एकमात्र उद्देश्य सौहाद्रता को बढ़ावा देना और दो समुदायों के बीच विश्वास का एक सेतु बनाना है। हमने संगठन के जरिए इस मुस्लिम शाखा को विस्तार दिया है और अब बारी है मुस्लिम समुदाय की वो हम में भी उसी तरह का भरोसा जताएं जिस तरह का भरोसा हमने उन पर जताया है।

जब अफजल से पूछा गया कि वो संघ की मुस्लिम विरोधी छवि को किस तरह से पाटने की कोशिश करेंगे, तो इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि संवादहीनता और कई तरह के पूर्वाग्रहों के चलते संघ और मुस्लिम समुदाय के बीच इस तरह की भावना ने जन्म लिया है। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा है कि इस सोच और भावना को समाज से दूर कर दिया जाए।

अफजल ने बताया, "समाज को कैसे सुधारना है ये हमें आरएसएस से सीखना होगा। यही एक ऐसी संस्था है जो हर तरह से सामाजिक मुद्दों पर काम करती है जैसे कि शिक्षा, महिला सशक्तीकरण और स्वास्थ्य। हमारे यहां ऐसी कोई तंजीम नहीं है जो कि इतनी संगठित हो और इन सारे मुद्दों पर काम करती हो। हमारे यहां सिर्फ मजहबी तंजीमें हैं जैसे कि जमात-ए-इस्लामी या तबलिगी जमात और ये आपस में ही शिया, सुन्नी और बरेलवी में बंटी हुई है।"

जब अफजल से पूछा गया कि क्या भाजपा ने उन्हें चुनाव प्रचार के लिए न्योता दिया है। इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि नहीं ऐसा नहीं है लेकिन हम भाजपा को समर्थन देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे।

एमआरएम और भाजपा की सोच में अतंर

एमआरएम के राष्ट्रीय सह संयोजक डॉ शाहिद अख्तर ने बताया कि एमआरएम सदस्यों और भाजपा कार्यकर्ताओं की राजनीतिक सोच में काफी भिन्नता है। हमारी कोई राजनीतिक अभिलाषा नहीं है। हम यह जिम्मेदारी नहीं दी गई है कि हम अल्पसंख्यक समुदाय को भाजपा की तरफ आकर्षित करें बल्कि हम ऐसा खुद की इच्छा से करते हैं।

उन्होंने बताया कि हम चाहते हैं कि हमारे समुदाय की सामाजिक और आर्थिक उन्नति हो। हम अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के बीच की खाई को पाटना चाहते हैं। हम मुस्लिम समुदाय की इस सोच को बदलना चाहते हैं कि भाजपा अछूत है। उन्होंने कहा कि हम लोगों को समझाते हैं कि वो सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता से थोड़ा उपर उठें और यह सोचें कि धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करने वाली कांग्रेस ने पिछले 60 सालों में उनके साथ क्या किया।

यह दिलचस्प बात है कि आरएसएस की हिंदू राष्ट्रवादी सोच और विश्व हिंदू परिषद की धार्मिक कट्टरता बारे में अख्तर और एमआरएम के राष्ट्रीय संगठन संयोजक गिरीश जुयाल की सोच में अंतर है। जहां एक ओर अख्तर का मानना है कि आरएसएस के भीतर धार्मिक कट्टरता है और एमआरएमस हिंदू राष्ट्र वाली सोच का समर्थन नहीं करती है जबकि जुयाल का मानना है कि विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल हिंसा में कभी भी विश्वास नहीं करते हैं।

अख्तर ने बताया कि हमारा मकसद है कि इन दोनों समुदायों को पास पास लाया जाए। इन दोनों समुदायों के बीच कुछ ऐसे तत्व हैं जिनका मानना है कि इन समुदायों को कभी भी नजदीक नहीं लाया जा सकता है। हम आरएसएस के भीतर भी इन्हीं तत्वों से लड़ते हैं। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम समुदायों में भी कुछ ऐसे नेता हैं जैसे कि ओवैशी, जो अपने भाषणों के जरिए भाई को भाई से लड़वाने की कोशिश करते रहते हैं।

आरएसएस नेताओं और एमआरएम मार्गदर्शक इंद्रेश कुमार के नजदीकी माने जाने वाले जुयाल तर्क देते हैं कि मीडिया द्वारा यह दुष्प्रचार किया गया है कि संघ संबंधित बजरंग दल और वीएचपी दंगे भड़काते हैं और हिंसक गतिविधियों को अंजाम देते हैं। इन संगठनों के बारे में यह गलतबयानी है। उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि आरएसएस, इससे जुड़े संगठन और मुस्लिमों के बीच फैले इस तरह के मतभेदों को दूर किया जाए। एमआरएम की शुरूआत पूर्व आरएसएस प्रमुख के एस सुदर्शन की पहल पर साल 2002 में मुस्लिमों को एक सार्थक मंच प्रदान करने के इरादे से हुई थी।
विज्ञापन

भाजपा को दिल्ली में जीत का भरोसा

इसी बीच आगामी चुनावों में भाजपा को जीत का पूरा भरोसा है और उसने इसके लिए क्षेत्र के मुस्लिम समुदाय के लिए एक विशेष प्लान तैयार किया है। करीब 12 ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों को चिन्हित किया गया है जहां मुस्लिम वोट बैंक का बोलबाला है।

पार्टी ने योजना बनाई है कि अल्पसंख्यक समुदायों के लिए भी विशेष प्रोग्राम आयोजित हों ताकि मोदी के विकास के एजेंडे से मुस्लिमों को भी जोड़ा जा सके।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें