इंदिरा गांधी की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। उसके बाद हुए नवंबर 1984 के सिख विरोधी दंगों से लोग आहत थे। माहौल बेहद संवेदनशील था।
एक तरफ तो आतंकवादियों और देश को तोडऩे वाली ताकतों के खिलाफ पूरा देश उबल रहा था तो दूसरी तरफ दिल्ली, कानपुर, बोकारो, जमशेदपुर आदि शहरों में जो हिंसा हुई थी, उसने केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया था।
अपनी मां की हत्या के फौरन बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने वाले राजीव गांधी सहानुभूति लहर पर सवार होकर लोकसभा चुनावों में उतरे थे, उधर विपक्ष विशेषकर चार साल पहले ही जनता पार्टी से अलग होकर बनी भारतीय जनता पार्टी को लग रहा था कि इंदिरा गांधी विहीन कांग्रेस को अब आसानी से सत्ता से हटाया जा सकता है, क्योंकि राजीव अभी राजनीति में नौसिखिए हैं।
राजमाता सिंधिया के हाथ थी चुनाव कमान
भाजपा पूरे जोरशोर से चुनाव मैदान में उतरी थी। उसने अपने सबसे बड़े और कद्दावर नेता अटल बिहारी वाजपेयी को मध्य प्रदेश के उस ग्वालियर लोकसभा सीट से मैदान में उतारा था, जहां से ग्वालियर राजपरिवार के वारिस माधवराव सिंधिया कांग्रेस उम्मीदवार थे।
सिंधिया परिवार की प्रमुख और माधव राव की मां राजमाता विजयराजे सिंधिया भाजपा की राष्ट्रीय नेता थीं। उनके सामने धर्म संकट था कि एक तरफ उनका अपना बेटा और दूसरी तरफ उनके धर्म पुत्र अटल बिहारी वाजपेयी मैदान में थे।
वाजपेयी ने खुद को राजमाता का धर्मपुत्र बताते हुए उनसे आशीर्वाद भी लिया था और राज धर्म निभाते हुए राजमाता पुत्र के खिलाफ वाजपेयी के चुनाव की जिम्मेदारी संभाल रही थीं।
वाजपेयी से कमतर न थे माधव राव सिंधिया
जहां माधवराव ग्वालियर की जनता से अपने परिवार के सैकड़ों साल पुराने रिश्तों की दुहाई देते हुए वोट मांग रहे थे, वहीं वाजपेयी का भी दावा मजबूत था क्योंकि उनकी शुरुआती शिक्षा ग्वालियर में ही हुई थी।
वाजपेयी का सियासी करिश्मा, भाषण कला और राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा कद लोगों को भा रहा था, लेकिन अपने श्रीमंत माधव राव सिंधिया का सम्मान भी ग्वालियर की जनता को बेहद प्रिय था।
मुकाबला कड़ा ही नहीं बेहद दिलचस्प था। पूरे देश की निगाहें इस चुनाव क्षेत्र पर थीं। वाजपेयी को जिताने के लिए न सिर्फ भाजपा बल्कि पूरे संघ परिवार ने एड़ी चोटी का जोर लगा रखा था, जबकि माधव राव को अपने स्थानीय कार्यकर्ताओं पर ज्यादा भरोसा था।
दोनों पार्टियों के बीच बंट गया था महल
संघ केकार्यकर्ता और प्रचारक घर घर घूम रहे थे। ग्वालियर राजघराने के खिलाफ लगातार आवाज उठाते रहे ग्वालियर चंबल संभाग और मध्य प्रदेश के तमाम राजनीतिक कार्यकर्ता भी वाजपेयी के लिए समर्थन जुटाने में लगे थे, उन्हें लगता था कि वाजपेयी की जीत से इस क्षेत्र से राजमहल का वर्चस्व टूटेगा और ग्वालियर को एक मजबूत स्थाई नेतृत्व मिलेगा जो राजमहल का नहीं होगा।
दिलचस्प यह था कि ग्वालियर राजमहल परिसर के दो महलों जयविलास पैलेस और राजविलास पैलेस से दोनों प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों का चुनाव अभियान चल रहा था।
जयविलास महल में माधवराव का निवास और चुनाव कार्यालय था, जबकि राजविलास महल में विजयराजे रहती थीं और वाजपेयी का चुनाव अभियान वहीं से संचालित हो रहा था। वाजपेयी खुद वहां रह रहे थे।
सिंधिया से बुरी तरह हारे थे वाजपेयी
राज कर्मचारी भी इसी हिसाब से बंटे हुए थे। राज प्रासाद परिसर में कांग्रेस और भाजपा दोनों के झंडों वाली गाडियों की धूम थे। दोनों के कार्यकर्ताओं की भीड़ रहती थी।
ग्वालियर शहर और गावों में भी राजपरिवार के प्रति निष्ठा विभाजित थी। कोई नहीं कह सकता था कि कौन जीतेगा। हालांकि बाहर के ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषक मानकर चल रहे थे कि कांटे के मुकाबले के बावजूद वाजपेयी ही जीतेंगे।
आखिर तक यह सस्पेंस बना रहा और जब मतगणना के बाद नतीजे आए तो वाजपेयी चुनाव हार चुके थे और युवा माधवराव सिंधिया बड़ी बढ़त बनाकर चुनाव जीते थे। इस चुनाव में पूरे देश में भाजपा को सिर्फ दो सीटें मिलीं थी जबकि कांग्रेस ऐतिहासिक रूप से 415 सीटें जीतकर सत्ता में लौटी थी।