सरकारी सुरक्षा प्राप्त करने के लिए अब आम आदमी को अपनी जेब ढीली करनी पड़ेगी। सुरक्षा पर आने वाले खर्च का एक हिस्सा सुरक्षा प्राप्त करने वाले व्यक्ति को देना होगा।
शासन ने सिक्योरिटी गार्ड मुहैया कराने की नीति संशोधित करते हुए जिला स्तरीय और राज्य स्तरीय समितियों की मनमानी समाप्त कर दी है। अब व्यक्ति की वार्षिक आय के आधार पर तय किया जाएगा कि उसे सिक्योरिटी का कितना प्रतिशत व्यय स्वयं वहन करना होगा।
प्रमुख सचिव गृह देवाशीष पांडा ने बुधवार को हाईकोर्ट में उपस्थित होकर इस नई नीति की जानकारी दी। वाराणसी के दवा व्यवसायी बलराम पांडेय की याचिका पर सुनवाई करते समय कोर्ट के समक्ष यह तथ्य आया कि सुरक्षा गार्ड उपलब्ध कराने में लिए जाने वाले खर्च को लेकर सरकार की कोई नीति नहीं है।
सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल और न्यायमूर्ति वीके मिश्र की खंडपीठ ने सरकार को इस संबंध में अपनी नीति बताने का निर्देश दिया था। स्थायी अधिवक्ता रमेश उपाध्याय ने बताया कि कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए एक गाइड लाइन तैयार की गई है।