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पढ़िए, कैसे बदल रही मोदी के इस गांव की सूरत

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‘कभी यहां अंबानी आएंगे और कभी ओबामा...।’ लालचंद अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि ‘क्यों नहीं आएंगे आखिर यह मोदी का गांव है।’
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जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जयापुर गांव को सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत गोद लिया है तब से गांव के हर व्यक्ति में एक आत्मगौरव जाग गया है। कुछ विशेष होने के इस एहसास को गांव में रोज पहुंचने वाली संस्थाएं और गहरा कर रही हैं।

इतना गहरा कि प्रपौत्र को देख चुकी 90 साल की देवकली की भी आंखों में चमक आ गई है। मन में कहने-सुनने को बहुत कुछ उमड़ पड़ता है।

दारापुर, इमलीतर, मोसेपुर, मालीपुर, जयापुर, दोनवारे का पुरा और बेलेतर जैसे सात पुरवों को मिलाकर बनी जयापुर ग्राम पंचायत के भवन पर रोजाना मेला लग रहा है।
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बुधवार को दोपहर तक यूनियन बैंक की नई शाखा के उद्घाटन की चहल-पहल थी और सोलर लाइट विक्रेता ने अपना डिमांस्ट्रेशन शुरू कर दिया। बगल के गांव चंदापुर से अपनी छठवीं क्लास का सबक सीखकर लौट रही सुमन एक पल ठहरकर सब कुछ देखने के बाद खड़ंजा सड़क पर आगे बढ़ गई ताकि घर जल्दी पहुंच सके। प्रधानमंत्री सात नवंबर को यहां आए थे। उसके एक हफ्ते पहले से ही गांव सुर्खियों में है।

गांव में रोज-रोज कुछ न कुछ घट रहा है। तीन हफ्ते से जारी ये बातें अब जयापुर की जिंदगी का हिस्सा हो गई हैं। लिहाजा कामकाजी अपने काम पर लग गए हैं। धान कट गया है और किसान उसकी मड़ाई करने में लगे हैं। दूसरी फसल बोने के लिए खेत सींच रहे हैं। सब्जी और फूल तोड़कर शहर पहुंचाने वाले भी अपने-अपने काम में लगे हैं। गांव में हर घर में गाय-भैंस है और अपने इस्तेमाल के बाद लोग रोजाना 500 लीटर दूध बाल्टे वालों के मार्फत शहर भेज देते हैं।
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बदल रही मोदी के गांव की सूरत

स्कूल, ग्राम पंचायत एवं न्याय पंचायत भवन को साफ-सुथरा करके रंग दिया गया है।

सड़क के किनारे की अन्य इमारतों को पंचायती राज विभाग, बैंकों और स्वयं सेवी संगठनों ने रंगकर उस पर विज्ञापन और प्रेरक नारे लिख दिए हैं। इसी रौनक की बदौलत जयापुर अगल-बगल के गांवों से अलग दिखने लगा है।

परंतु प्रधानमंत्री के आगमन के बाद गांव में इन बाहरी परिवर्तन से ज्यादा बदलाव लोगों के भीतर हुए हैं। चहल-पहल बढ़ने से रोजगार के मौके भी बढ़े हैं। लक्ष्मी देवी कभी गांव में लौंगलता, समोसा बेचती थीं लेकिन उनकी दूकान टूट गई थी।

अब पंचायत भवन के पास दोबारा दूकान खुल गई है और कहती हैं कि यही रहा तो धंधा फिर जम जाएगा। लालचंद कभी सब्जी का कारोबार करते थे। वह बताते हैं कि ताल क्षेत्र होने के बावजूद सब्जी अनुसंधान केंद्र के पूर्व निदेशक कल्लू गौतम की प्रेरणा से दो दशक पहले गांव में इतना टमाटर होता था कि कोलकाता तक भेजा जाता था।

सब्जी की खेती में इतना फायदा था कि कई लोग नौकरी छोड़कर किसानी करने लगे। बाद में घड़रोज (नीलगाय) से आजिज आकर लोगों ने सब्जी की खेती बंद कर दी। लोगों के मन में एक बार फिर सब्जी की खेती लहलहाने लगी है।

लोगों में आ रहे इस बदलाव से 90 साल की देवकली अछूती नहीं हैं। वह बरबस बोल पड़ती हैं कि ‘ऊ जमाना भी देखले हईं जब मंड़ई उलट जात रहल (प्लेग आने पर लोग गांव छोड़ देते थे।)। अब त् सब पढ़त लिखत हौ, खुशहाल हौ।’ उनकी बात को पूरी करते हुए ग्राम प्रधान दुर्गावती पटेल के देवर नारायण पटेल कहते हैं कि बस उनका (पीएम का) इशारा होगा और एक झटके में गांव की सूरत बदल जाएगी।
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