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मोदी पर क्यों मेहरबान हुआ यूरोप?

Sat, 18 Apr 2015 03:30 PM IST
अपूर्व कृष्ण/बीबीसी संवाददाता
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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी फ्रांस यात्रा के दौरान पेरिस में बसे कई प्रवासी भारतीयों से मिले। उन सबके लिए ये एक बड़े सपने के पूरे होने के जैसा था। मगर फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसुआ ओलांद और जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल के साथ जर्मनी में मुलाकात, शायद मोदी के लिए कुछ समय पहले तक सपने से कम नहीं था।
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2002 के गुजरात दंगों को लेकर यूरोपीय देशों ने एक तरह से मोदी का नाम काली सूची में डाला हुआ था। मगर अब फ्रांस और जर्मनी जैसे बड़े देशों में मोदी का स्वागत और सम्मान हो रहा है।

फ्रांस में बसे रमेश मुलभार भातीय विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी हैं और अब एक अंतरराष्ट्रीय कंसल्टेंसी फर्म के प्रमुख और सीआईआई के सलाहकार हैं। उनका मानना है कि मोदी को लेकर यूरोप के मन बदलने के पीछे एक व्यावहारिक कारण है।
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वो कहते हैं, ”यूरोप को जरूरत है कि अपने उत्पादों के निर्यात के लिए कहीं कोई बाजार मिले और चीन के बाद सबसे बड़ा बाजार है भारत। इसमें उनकी दिलचस्पी है और भारत में रास्ते भी खुल रहे हैं। वे जरूर कोशिश करेंगे। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में लोग पुरानी बातों को जल्दी भुला देते हैं।"

मगर मोदी के विदेश दौरों को लेकर भारत की मीडिया में जैसा उत्साह दिखाया जाता है, क्या वैसा उत्साह उन देशों में होता है जहां मोदी जाते हैं?
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दोनों को है जरूरत

पेरिस में बसी भारतीय पत्रकार वैजू नरावने कहती हैं, "जब ओबामा या पुतिन या चीन के नेता आते हैं, तब तो यहां के मीडिया में काफी चर्चा होती है, मगर भारत के किसी नेता के आने पर वैसी खबर नहीं होती। इस बार भी मोदी के आने पर फ्रांस में खबर तब छपी जब उन्होंने 36 लड़ाकू विमानों की खरीद का सौदा किया क्योंकि ये उनके मुनाफे की खबर थी।"

यानी जरूरत दोनों तरफ है, यूरोप की नजर बाजार पर है, तो भारत को चाहिए अमरीका-ब्रिटेन-रूस-चीन जैसे ताकतवर देशों को हासिल अंतरराष्ट्रीय रुतबा।

ऐसे में हैरानी की बात नहीं है कि दोनों पक्ष अपने आपसी संबंधों की गाड़ी को आगे बढ़ाकर अपने-अपने लक्ष्य तक पहुंचने की कोशिश करेंगे।
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