फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'गोडसे' नहीं अब 'नाथूराम गोडसे' हुए असंसदीय

Sat, 18 Apr 2015 03:30 PM IST
हिमांशु मिश्र/अमर उजाला, दिल्ली
विज्ञापन
विज्ञापन
'गोडसे' अब असंसदीय शब्द नहीं माना जाएगा। इस मुद्दे पर संसद के बीते शीत सत्र में उपजे विवाद के करीब 4 महीने बाद लोकसभा और राज्यसभा के सचिवालय ने 'गोडसे' की जगह नाथूराम गोडसे को असंसदीय शब्दों की सूची में डाला।
विज्ञापन


वर्ष 1956 में संसद के दोनों सदनों के सचिवालय ने महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की जगह उनके सरनेम गोडसे को ही असंसदीय शब्दों सूची में डाल दिया था। विवाद ने तब तूल पकड़ा था जब बीते 11 दिसंबर को राज्यसभा के उपसभापति पीजे कुरियन ने माकपा सांसद को गोडसे का नाम लेने से यह कह कर रोका कि यह शब्द असंसदीय है।

उक्त सांसद उत्तर प्रदेश में गोडसे का मंदिर बनाए जाने संबंधी हिंदूवादी संस्था के एक नेता के बयान पर विरोध जता रहे थे। तब कुरियन ने गोडसे को असंसदीय शब्द बताते हुए इसे कार्यवाही वृतांत से बाहर कर दिया था।
विज्ञापन

विवाद के बाद सूची से हटा गोडसे

महाराष्ट्र के नासिक के शिवसेना सांसद हेमंत तुकाराम गोडसे ने इस पर एतराज जताते हुए राज्यसभा के उपसभापति कुरियन के साथ-साथ लोकसभा की स्पीकर सुमित्रा महाजन को पत्र लिख कर अपना विरोध जताया था।

गोडसे का कहना था कि गोडसे शब्द को असंसदीय शब्दों की सूची में डालना एक वर्ग और एक जाति पर प्रहार है। उन्होंने इसे एक जाति विशेष का अपमान बताते हुए सवाल किया था कि किसी एक व्यक्ति की निंदनीय कार्रवाई की जिम्मेदारी उससे संबंधित समूची बिरादरी पर कैसे डाला जा सकता है? संसद में 'गोडसे'  बोलना अब असंसदीय नहीं होगा।

इसी सरनेम के एक सांसद द्वारा कड़ी आपत्ति जताने के बाद कुरियन और महाजन ने सचिवालय को विवाद का हल निकालने का निर्देश दिया था। दोनों सदनों के सचिवालय ने गोडसे की जगह अब नाथूराम गोडसे को असंसदीय शब्दों की सूची में डालने का फैसला कर इस आशय की जानकारी विरोध जताने वाले सांसद गोडसे को दे दी है। बृहस्पतिवार को दोनों सचिवालय ने पत्र लिख कर इस आशय का फैसला करने की जानकारी दी है।
विज्ञापन

गोडसे उपनाम को वालों को सजा क्यों?

उल्लेखनीय है कि वर्ष 1956 में संसदीय सचिवालय नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या के मद्देनजर गोडसे शब्द को असंसदीय शब्दों की सूची में डाल दिया था।

इस संबंध में विरोध जताने वाले सांसद हेमंत तुकाराम गोडसे ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि गोडसे शब्द को असंसदीय सूची में डाले जाने की सूचना से वह स्तब्ध थे। आखिर किसी एक व्यक्ति की करनी की सजा उसके ही जैसा उपनाम रखने वाले लाखों लोगों को कैसे दी जा सकती है। वह भी तब जब गोडसे उपनाम वाले को निर्वाचन आयोग भी चुनाव लड़ने की इजाजत देता है।

मामले पर शिवसेना सांसद हेमंत तुकाराम गोडसे ने कहा, 'मुझे संतोष है कि आखिर गोडसे शब्द अब असंसदीय नहीं रहा। दुख इस बात का है कि बीते छह दशक तक यह उपनाम असंसदीय शब्दों की सूची में रहा। यह एक तरह से गोडसे उपनाम रखने वाले लाखों लोगों को बिना किसी अपराध के दी गई सजा थी।'
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें