भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामकाज की शैली की मीडिया में काफ़ी चर्चा हो रही है। कई लोगों को मानना है कि इस मामले में वो अपने सभी पूर्ववर्तियों से अलग हैं।
मनमोहन सिंह को निर्णय करने में अक्षम और सुस्त प्रधानमंत्री के रूप में देखा गया। उनके प्रति बहुत सहानुभूति रखने वाले लोग भी उन्हें ज़रूरत से ज़्यादा सतर्क रहने वाला नेता तो मानेंगे ही।
मनमोहन सिंह को कमज़ोर और अपनी बात रखने में असमर्थ प्रधानमंत्री भी माना गया। नरेंद्र मोदी को मनमोहन सिंह के उलट एक दृढ़निश्चयी, मज़बूत, त्वरित निर्णय लेने वाला आत्म विश्वासी नेता माना जाता है।
मोदी के लिए पॉवर प्वाइंट प्रजेंटेशन खास है
उनके कार्यकाल संभालने के बाद से जो ख़बरें आईं हैं, उनसे उनकी ख़ास शैली की पुष्टि ही होती है। ऐसे में उनके व्यक्तित्व के कुछ पहलूओं पर ग़ौर करना लाज़मी है।
मोदी और उनके पूर्ववर्तियों में सबसे पहला अंतर है उनका नौकरशाहों से बरताव का तरीका। तीन जून के मोदी ने भारत सरकार के विभिन्न विभाग के सचिवों के साथ बैठक की। वो यह समझना चाहते थे कि देश में क्या कुछ चल रहा है।
उनकी इस बैठक के बाद मीडिया में आई एक रिपोर्ट में उन्होंने कहा, "देश के शीर्ष नौकरशाहों को अपना प्रजेंटेंशन देने के लिए कहा गया। शनिवार को जारी आदेश के अनुसार हर सचिव को अपनी प्रस्तुति के लिए 10 स्लाइडों वाले पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन के लिए दस मिनट दिए जाने थे"
फाइल नहीं पढ़ते, सुनते हैं मोदी
अपने एक इंटरव्यू में मोदी ने बताया कि वो फ़ाइलों को नहीं पढ़ते। उनके शब्दों में कहें तो वो 'अकादमिक अध्ययन' वाले तरीकों से कामकाज नहीं करते। किसी विषय को समझने के लिए वो पढ़ते नहीं, बल्कि सुनते हैं।
मोदी उन नौकरशाहों की सुनते हैं जिनसे उम्मीद की जाती है कि वो सारी फ़ाइलें पढ़कर उनका सारतत्व कुछ पंक्तियों में नरेंद्र मोदी को बता देंगे। इस सरलीकरण के बाद, मोदी मुद्दे को समझकर तत्काल अपना निर्णय या टिप्पणी दे देंगे।
प्रधानमंत्री मोदी का पावर प्वाइंट प्रजेंटेंशन को प्राथमिकता देना, उनके जटिल और बहुआयामी मामलों को बुलेट प्वाइंट्स में बदल देना उनकी शैली के अनुरूप ही है।
कहीं ये बातें मुश्किल न करदें मोदी की राह
नरेंद्र मोदी की जो तीन बातें मुझे सोचने पर मज़बूर करती हैं उनका मैं बिंदुवार जिक्र करना चाहूँगा।
पहला, प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो दूसरे से मिली सूचनाओं पर बहुत ज़्यादा आश्रित हैं। इससे लंबे दस्तावेज़ पढ़ने के प्रति अरुचि या अयोग्ता का पता चलता है।
दूसरा, कुछ ज़्यादा ही जल्दी फ़ैसले ले लेने की आदत को हर स्थिति में एक अच्छी आदत नहीं माना जा सकता।
जब मैंने ये बातें एक टीवी शो के दौरान कही थीं तो कार्यक्रम में शामिल एक सेवानिवृत्त नौकरशाह भड़क उठी थी। उनका कहना था कि ये कोई नई बात नहीं है, 'कोई भी प्रधानमंत्री फ़ाइलें नहीं पढ़ता।' हालांकि मैं मोदी और मनमोहन की कामकाज की शैली को तुलना नहीं कर पा रहा था। यह मानना मेरे लिए मुश्किल भरा है कि दोनों एक ही तरह से काम करते हैं।
ऐसे प्रधान मंत्री जिन्हें निर्णय लेने में मुश्किलें थी
मनमोहन सिंह के लिए ऊपर मैंने जो विशेषण प्रयोग किए हैं उसके पीछे उनकी किसी विषय के विस्तृत ब्योरे में जाने की आदत और तथ्यों के मामले में उनकी महारत थी। उनके इंटरव्यू से पता चलता है कि जटिल मुद्दों पर उनकी कैसी पकड़ थी।
अगर वो निर्णय लेने में अक्षम थे या उन्हें ऐसा माना गया तो इसकी वजह थी अगर कोई व्यक्ति किसी मुद्दे की बहुत गहराई से पड़ताल करे और तथ्यों के ब्योरे में जाए तो आसान उपाय पाना मुश्किल हो जाता है।
मुंबई में लश्कर-ए-तैयबा की तरफ़ से किए गए हमले के बाद मनमोहन सिंह ने संभावित जवाबी कार्रवाई के विकल्पों पर विचार किया।
उनसे सेना ने कहा कि चरमपंथी कैम्पों पर हवाई हमला किया जा सकता है लेकिन "इन कैम्पों के सटीक निर्देशांक और पर्याप्त जानकारी" नहीं थी।
मनमोहन सरकार के निर्णय की स्थिति
एक अंग्रेजी अखबार के पत्रकार प्रवीण स्वामी ने एक रिपोर्ट में लिखा, "तत्कालीन सेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री से कहा कि इस बात की गारंटी नहीं दे सकते कि स्पेशल फोर्स का हमला सफल ही होगा। इस बात की भी गारंटी नहीं दी जा सकती कि मिसाइलों के हमले युद्ध या परमाणु युद्ध तक में नहीं बदल जाएंगे। और इस बात की भी गारंटी नहीं है कि इस हमले के बाद पाकिस्तानी सेना ऐसे हमले के बाद अपने तौर-तरीके बदल लेगी।"
मनमोहन सिंह ने उस वक्त कुछ नहीं किया और क्यों नहीं किया ये समझना काफ़ी आसान है। ऐसे हालात में निर्णय न ले पाना या भ्रमित रह जाना एक तरह से अच्छा ही है।
जबकि नरेंद्र मोदी की तीसरी शैली है, चीज़ों पर अपना नियंत्रण बनाए रखना।
मोदी सरकार पर खास मीडिया रिपोर्ट
रेडिफ़ डॉटकॉम पर इसी हफ़्ते छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मोदी प्रधानमंत्री कार्यालय में निर्णय लेने के अधिकार और शक्ति को केंद्रीकृत कर रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, "सरकार के विभिन्न विभागों के सचिवों से कहा गया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय से भेजी गई फाइलों को तत्काल निपटाएं और सचिवों को इन फ़ाइलों को संबंध मंत्री के विचार हेतु न रोका जाए।"
रिपोर्ट के अनुसार "यह 'निर्देश' विभिन्न मंत्रियों के 'निर्णय लेने के अधिकार में कटौती' कर देगा। प्रधानमंत्री कार्यालय के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी विषय विशेष और मंत्रालयों की निगरानी करेंगे और प्रधानमंत्री के निर्देश पर निर्णय लेंगे। ये सचिव, जो विभिन्न विभागों के प्रमुख होते हैं, उनसे उम्मीद की जाती है कि वो फ़ाइलों को बग़ैर किसी देरी के निपटा देंगे। "
नरेंद्र मोदी के रवैए को सकारात्मक नज़रिए से भी देखा जा सकता है। इसे एक ज़िम्मेदारी भरा रवैया भी माना जा सकता है, जिसके तहत प्रधानमंत्री अपनी वाहवाही करते हुए कह सकते हैं कि वो ख़ुद सारे मामले देख रहे हैं और वो दूसरों पर काम नहीं टालते।
जैसा कि मनमोहन सिंह के समय में होता था। लेकिन उनके कामकाज की शैली का नकारात्मक पक्ष भी जाहिर है, जिसकी चर्चा आज नहीं करेंगे।