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क्या नरेंद्र मोदी अंधेरे में तीर चला रहे हैं?

Sun, 27 Dec 2015 05:41 AM IST
सुशांत सरीन, बीबीसी हिंदी
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यह 12 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली पाकिस्तान यात्रा थी। इस यात्रा को लेकर दक्षिण एशिया मामलों के जानकार सुशांत सरीन की राय-
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इस तरह सबको अचंभित कर देना एक तरह से नरेंद्र मोदी की कूटनीति को परिभाषित करने वाली शैली बन गई है।
वे खुद ही निर्णय लेते हैं कि क्या करना है। किसी को कुछ पता नहीं होता इसलिए सारे लोग अंधेरे में तीर चलाते रहते हैं लेकिन उम्मीद करनी चाहिए कि प्रधानमंत्री को पता हो कि वे क्या कर रहे हैं।
जहां तक खुद प्रधानमंत्री मोदी के अंधेरे में तीर चलाने की संभावना है तो वो ऐसा करने वाले पहले प्रधानमंत्री नहीं है। 
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शोमैनशिप के पीछे भी हैं अहम मुद्दे

इससे पहले भी, पाकिस्तान को लेकर भारत के प्रधानमंत्रियों ने अंधेरे तीर चलाया है। लेकिन इससे कुछ हासिल होता नहीं है। चर्चा तो बहुत होगी, हो रही है लेकिन इसमें ठोस क्या है।
बात यह है, इस शोमैनशिप के पीछे जो अहम मुद्दे हैं, जो शक-ओ-शुबहा हैं उन पर और मुश्किल मुद्दों पर बात होगी, तो फिर क्या होगा, ज़्यादा चीजें इस बात पर निर्भर करती हैं।
हम देख चुके हैं इस तरह मिलना-मिलाना, माहौल सुधारने की कोशिश करना और लोगों का आना-जाना, ये सब पहले भी बहुत हो चुका है। 

मुद्दों पर बात हमेशा ही अटकती

मगर जब मुद्दों पर बात होती है तो बात अटक जाती है। ऐसी कौन सी नई चीज़ हुई है, जिससे नरेंद्र मोदी पाकिस्तान को लेकर इतने उत्साहित हो रहे हैं या ऐसी कौन सी योजना उनके दिमाग़ में है, जो 70 साल पुराना अवरोध ख़त्म कर पाएगा।
यह यात्रा पहले से तय थी या अचानक हुई, यह बात ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं है । वे जो तहलका मचाना चाहते थे, वह उन्होंने मचा लिया।
लेकिन पाकिस्तान जैसे देश के साथ धीरे-धीरे और सोच-समझकर आगे बढ़ा जाए, तो बेहतर रहेगा क्योंकि मुद्दे बहुत जटिल हैं और उनमें समस्याएं बहुत हैं।
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पाकिस्तान का उत्साह अवास्तविक था

पाकिस्तान में नीति के स्तर पर तो कुछ बदलाव नजर नहीं आ रहा है। यह जो उत्साह दिख रहा है, वह थोड़ा अब अवास्तविक सा लग रहा है।
हो सकता है भारत को पर्दे के पीछे कुछ आश्वासन मिले हों, पर मैं उन्हें संजीदगी से नहीं लेता क्योंकि पाकिस्तान से पहले भी बहुत से आश्वासन मिले हैं लेकिन उस पर वो अमल नहीं करता उल्टे इसके विपरीत चीज़ें भी करता है।
मेरा मानना है कि 70 साल बाद अब हमको ज़्यादा व्यवहारिक होने की ज़रूरत है। ज़मीनी स्तर पर जो हो रहा है, उस पर ज़्यादा तवज्जो दें तो बेहतर होगा।
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