नरेंद्र मोदी और बराक ओबामा की दोस्ती अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बनी हुई है। संघ के पुराने प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी और कानून के प्रोफेसर बराक ओबामा के रिश्ते पठारी रास्तों की तरह हैं। कभी ऊंचे तो कभी नीचे।
हालांकि दोनों नेताओं की योजना उन्हीं रिश्तों की बुनियाद पर दीर्घकालिक लाभ की इमारत खड़ी करने की है। मोदी की पिछली अमेरिका यात्रा में कई ऐसी बातें सामने आईं थीं, जिन्होंने भारत और अमेरिका के बीच नई शुरुआत के संकेत दिए थे।
मार्टिन लूथर किंग जूनियर मेमोरियल परिसर में ओबामा ने अपने सुरक्षा स्टाफ को पीछे छोड़ दिया और मोदी के साथ 15 मिनट तक चहलकदमी करते रहे।
उसी सरगर्मी में मोदी ने उन्हें गणतंत्र दिवस में शामिल होने का न्योता दिया था। उस न्योते को ओबामा ने कुछ ही दिनों बाद स्वीकार कर लिया।
गौरतलब है कि लोकसभा चुनावों से पहले अमेरिका ने नरेंद्र मोदी को वीजा देने से इनकार कर दिया था। गुजरात दंगों के छीटों के कारण मोदी और अमेरिकी प्रशासन के रिश्तें कई सालों तक तल्ख भी रह चुके हैं।
अब चूंकी दोनों के रिश्तों में नए युग की शुरुआत हो चुकी है, इसलिए इन रिश्तों से निश्चित रुप से दोनों को लाभ होगा?
भू-राजनीतिक हालातों ने बदले ओबामा और मोदी के रिश्ते
माना जा रहा है कि दोनों नेताओं के रिश्तों में आई सरगर्मी का बड़ा कारण भू-राजनीतिक हालात में आए बदलाव भी हैं। चीन हिंद महासागर में लगातार अपना विस्तार कर रहा है। चीनी विस्तार से भारत और अमेरिका दोनों ही भयभीत हैं। यही कारण है कि चीन अमेरिका और भारत के बीच दोस्ती का कारण भी बन रहा है।
श्रीलंका में चीन समर्थक सरकार महिंदा राजपक्षे हाल ही में सत्ता से बेदखल हो गई। ये अब तक तय नहीं है कि श्रीलंका में नई सरकार आने से भारत को अधिक लाभ होगा या अमेरिका को लेकिन ये तो तय हो गया कि कम से कम चीन का विस्तार हिंद महासागर में थम जाएगा।
पिछले कुछ सालों में भारत और अमेरिका के रिश्तों में एक रुकावट उस कानून के कारण भी आई, जिसके तहत अमेरिकी कंपनियों को भारत में न्यूक्लियर पॉवर प्लांट के निर्माण से रोक दिया गया था। यह कानून भारतीय संसद ने 2010 में पारित किया था।
मोदी-ओबामा की दोस्ती व्यापारिक रिश्तों की बहाली का संकेत
मोदी और ओबामा की दोस्ती से दोनों मुल्कों के व्यापारिक रिश्तों में भी सरगर्मी आने के संकेत हैं। अमेरिका से कई रक्षा सौदों को अंतिम रूप दिए जाने पर बातचीत चल रही है।
भारत भी दवाओं के निर्यात के मसले पर अमेरिका से रियायत पाने की कोशिश में है। अमेरिका ने कई भारतीय दवाओं को पेटेंट या सुरक्षा कारणों से प्रतिबंधित कर रखा है।
अमेरिकी राजनीति के जानकारों का मानना है कि राष्ट्रपति बराक ओबामा आसानी से किसी अतंराष्ट्रीय नेता से मित्रवत रिश्तें नहीं बनाते, लेकिन मोदी एक अपवाद हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण मोदी और ओबामा की पृष्ठभूमि है।
दोनों ही नेता गरीबी से उठे हैं और दोनों ही अवसरों को इस्तेमाल कर आगे बढ़े हैं। दोनों ने ही चुनावों में जीत के लिए तकनीकी का इस्तेमाल किया। दोनों के चुनाव अभियानों ने जनता का अपेक्षाओं को बढ़ा दिया और सबसे रोचक यह कि दोनों जनता से किए वादों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
आम चुनाव के दौरान ही अमेरिका ने बढ़ाए थे दोस्ती के हाथ
मोदी और अमेरिका के रिश्तों में सुधार की शुरुआत लोकसभा चुनावों से पहले हुई थी। लगभग नौ वर्षों तक मोदी का बहिष्कार करने के बाद भारत में अमेरिकी राजदूत नैंसी पॉवेल ने मोदी से मुलाकात की थी। हालांकि पॉवेल ने उसके कुछ समय बाद ही इस्तीफा दे दिया।
मोदी ने सत्ता में आने के बाद अमेरिका से रिश्ते सहज करने के लिए कई कदम उठाए। उन्हें अमरिकी मामलों के लिए दो सलाहकारों की नियुक्ति की। रोचक बात यह थी ये दोनों ही लंबे समय से अमेरिका में रह रहे थे। देवयानी खोबरागड़े के विवादित मामले से भी सरकार ने खुद को अलग कर लिया।
अमेरिका ने भी भारत से रिश्तों में सुधार के लिए कई कदम उठाए। एफबीआई ने अपने ही पूर्व राजनयिक रॉबिन एल रॉफेल के खिलाफ जांच की शुरुआत की। भारतीय एजेंसियां रॉफेल पर पाकिस्तान के पक्ष में अमेरिकी नीतियों को प्रभावित करने का आरोप लगाती रहीं थीं।