सियासत ऐसी बला है कि जहां पहुंच जाए, बवाल खड़ा कर देती है। फर्ज कीजिए कि अकादमिक जगत के उस्तादों की जंग राजनीतिक मैदान तक पहुंच जाए, तो कैसा नजारा होगा?
आम चुनावों की ओर बढ़ते देश में इन दिनों नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की 'दुश्मनी' खासी सुर्खियां बटोर रही है और अब इस लड़ाई में बुद्धिजीवी वर्ग भी कूद गया है।
ईटी की खबर के मुताबिक कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले जगदीश भगवती और अरविंद पनागरिया की जोड़ी ने मोदी के पक्ष में मोर्चा खोल दिया है। हमले नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन पर हो रहे हैं, लेकिन वह भी मैदान छोड़ने को तैयार नहीं।
एक इंटरव्यू में भगवती-अरविंद ने कहा, 'हम मोदी के इकनॉमिक्स से प्रभावित हैं।' कांग्रेस नीतीश के जनता दल यूनाइटेड से पींगे बढ़ा रही है, जिसने हाल में भाजपा से 17 साल पुराना रिश्ता तोड़ा है।
भगवती ने कई बार सेन को इस विषय पर खुली बहस की चुनौती दी है कि विकास तक ग्रोथ से पहुंचा जाता है या मानव क्षमताओं में निवेश से। लेकिन दोनों की बहस ने हाल में राजनीतिक रंग ले लिया है।
गुजरात मॉडल पर बहस
सेन का कहना है, 'जगदीश ने कई बार ऐसी कोशिश की है, लेकिन मैंने कभी उनके बारे में कुछ नहीं कहा।' पिछले साल अपनी किताब में भगवती और अरविंद ने केरल मॉडल बनाम गुजरात मॉडल की बहस को सामने ला दिया था।
सेन कई बार 'केरल अनुभव' को भारतीय राज्यों के विकास का सही मॉडल बता चुके हैं, जिसमें प्रदेश की अगुवाई में विकास होता है।
भगवती-अरविंद की किताब में केरल मॉडल को प्रमुख रूप से रीडिस्ट्रीब्यूशन और प्रदेश आधारित विकास का प्रतीक माना गया है, जबकि गुजरात मॉडल को ऐसे विकास का प्रतीक बताया गया है, जिसकी अगुवाई ग्रोथ और उद्यमिता करती है।
सेन की दलीलों को खारिज करते हुए लेखकों ने कहा है कि गरीबी घटाने के लिए ग्रोथ एकमात्र सबसे मजबूत टूल है और भारत को ग्रोथ बढ़ाने के लिए इन दोनों की जरूरत है।
दूसरी ओर सेन का कहना है, 'एक शिक्षित और स्वस्थ वर्कफोर्स इकनॉमिक ग्रोथ का इंतजाम करती है और इसके लिए हमें बुनियादी बदलावों की जरूरत है।'