फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मोदी सरकार से अमेरिका की मुश्किल

Thu, 31 Jul 2014 06:43 PM IST
सिद्धार्थ वरदराजन वरिष्ठ पत्रकार/ बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
विज्ञापन
विज्ञापन
अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन केरी भारत यात्रा पर है। उनकी इस यात्रा को भारत और अमरीका के आपसी संबंधों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विज्ञापन


एक ओर अमेरिका की नज़र भारत के साथ परमाणु ऊर्जा संयंत्र संबंधी कारोबार और दवा कंपनियों की भारत में पहुंच की राह को सहज बनाने की होगी, वहीं दूसरी ओर भारत उच्च शिक्षा और व्यावहारिक प्रशिक्षण एवं अक्षय ऊर्जा के मसले पर सहयोग बढ़ाने की दिशा में संबंध को मज़बूत करना चाहेगा।

आपसी कारोबार को बढ़ाने की दिशा में दोनों देश पहल दिखाएंगे। लेकिन जॉन केरी की भारत यात्रा में दोनों देशों के आपसी संबंध से ज़्यादा महत्वपूर्ण दूसरे देश होंगे। अमेरिका इन दिनों दुनिया भर के कई देशों में संघर्ष का सामना कर रहा है, वहीं भारत की प्राथमिकता भी दक्षिण एशियाई में स्थिरता की है।
विज्ञापन


ऐसे में वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन के मुताबिक भारत और अमरीका के बीच उच्चस्तरीय बैठकों में अफ़ग़ानिस्तान और चीन अहम मुद्दा साबित होंगे। अमेरीकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने मंगलवार को दिए 5000 शब्दों के भाषण में कई बार भारत और अमेरीका के बीच आपसी संबंधों के महत्व का जिक्र किया।

लेकिन उनका ये भाषण दोनों देशों के रिश्तों में आए अविश्वास को नहीं भर सकता। केरी नई दिल्ली रवाना होने से कुछ ही घंटे पहले वाशिंगटन डीसी के अमेरीकन प्रोग्रेस सेंटर में बोल रहे थे। वे भारत के साथ पांचवीं सालाना 'रणनीतिक साझेदारी' की बैठक में हिस्सा लेने वाले प्रतिनिधि मंडल के मुखिया हैं।

भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री को करीब एक दशक तक वीज़ा देने से इनकार करने के मुद्दे को अगर छोड़ भी दें तो अमेरीकी प्रशासन को यह मालूम है कि भारत के साथ उसकी 'रणनीतिक साझेदारी' पिछले कुछ सालों में अपनी गति और दिशा दोनों खो चुकी है। इसके चार मोटे-मोटे कारण हैं।

दोनों हैं निराश

पहला तो, वॉशिंगटन प्रशासन इस बात से निराश है कि भारत ने परमाणु ऊर्जा, दवाइयां, खुदरा व्यापार, फ़ाइनेंसियल सर्विसेज़ और मिलिट्री हार्डवेयर के क्षेत्र में अमेरीका के आर्थिक हितों को पूरा करने के लिए अपने कानून और नियमों में ढील नहीं दी।

भारत भी अमरीकी प्रशासन के इस कारोबारी रवैए से भी निराश हुआ है।एक दूसरे की उम्मीदों पर खरा न उतर पाने का संकट इतना गहराता नहीं, अगर दूसरा कारण मौजूद नहीं होता। ये कारण है भारत की आर्थिक विकास दर का मंद होना है। इस मंदी के चलते अमेरीकी कंपनियों को भारतीय अर्थव्यवस्था से ज़्यादा फ़ायदा नहीं हुआ। इस वजह से अमेरीका की बेसब्री बढ़ी।

अमेरीका चाहता है कि भारत विश्व व्यापार संगठन के बैनर तले उसकी पश्चिमी आर्थिक नीतियों का समर्थन करे जिसे वह पूरी दुनिया पर थोपना चाहता है। तीसरा कारण है पिछले कुछ सालों में क्षेत्रीय और भूमंडलीय परिस्थितियों में आया बदलाव और जटिल हुई परिस्थितियां। लेकिन इन परिस्थितियों में भी अनिवार्य साझेदारों ने एक दूसरे के मसले पर चुप्पी साधे रखी।

अमेरीका इन दिनों जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है- उसमें यूक्रेन, सीरिया, ग़ज़ा और ईरान की समस्याएं हैं और इन मसलों पर भारत अमेरीका की क्या मदद कर रहा है? दूसरी ओर भारत इस बात को भी समझ रहा है कि वॉशिंगटन प्रशासन पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान में अहम भूमिका निभा रहा है। ऐसे में भारतीय प्रशासन अपने साझेदारों की संख्या बढ़ाना चाहता है।

चीन पर नज़र

हालांकि एशिया पैसेफिक क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी रणनीतिक चुनौतियों को देखते हुए भारत यह जानता है कि अमेरीका की एशिया में वापसी से क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ेगी।ये भी सच है कि इलाके के सभी देश चीन की बढ़ती ताक़त को देखते हुए क्षेत्र में अमेरीका की सैन्य स्थिति को मज़बूत करने के पक्ष में हैं।

भारत ये भी जानता है कि चीन की बढ़ती ताकत का सामना करने के लिए एक नैटो सरीखी संस्था का होना जरूरी है। इसके होने से जरूरत पड़ने पर भारत चीन के विरोध करने वाले देशों का पक्ष ले सकता है और जरूरत पड़ने पर चीन से बड़े अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर हाथ मिला सकता है।

भारत के गुटनिरपेक्षवाद के दूसरे दौर की कोशिशें वाशिंगटन प्रशासन को नाराज करने वाली है। लेकिन मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में इससे बेहतर रणनीति कोई और नहीं हो सकती।

चौथा कारण हाल के विवाद से जुड़ा है। जिसके मुताबिक अमेरीकी प्रशासन भारत में आक्रामक तरीके से जासूसी करा रहा है, जिसमें अमेरीका का राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के ज़रिए बीजेपी की जासूसी करना भी शामिल है।

अमेरीकी जासूसी की ख़बर के सामने आने के बाद कोई भी आत्म सम्मान वाला देश चुप नहीं रह सकता। साल 2013 में एडवर्ड स्नोडन की ओर से जानकारियाँ लीक होने के मामले में मनमोहन सिंह की सरकार की प्रतिक्रिया को दब्बू और नरमी वाला माना गया था। नरेंद्र मोदी की सरकार वैसा रूझान नहीं दिखाएगी।

कारोबारी नजरिया

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए केरी ने भारत दौरे से पहले दिए अपने संबोधन में इन चार में महज दो मुद्दों की चर्चा की। अमेरीका भारत से मांग कर रहा है कि वह आण्विक दायित्व कानून के उस पहलू को लचीला बनाए जिसमें ख़राब उपकरण के चलते किसी परमाणु दुर्घटना होने पर अमेरीकी परमाणु उपकरण मुहैया कराने वाली कंपनियों से हर्ज़ाना वसूलने की व्यवस्था शामिल है।

केरी ने इस मुद्दे पर कहा, "अमेरीका-भारत सिविल न्यूक्लियर एग्रीमेंट के तहत अब अमेरीकी कंपनियों को भारत के अंदर काम शुरू करना है और लाखों लोगों को ऊर्जा मुहैया करानी है।"

हम ये जानते हैं कि अमेरीका ने भारत को उन देशों में शामिल कर रखा है कि जिनके पेटेंट कानून कथित तौर पर अपर्याप्त हैं, क्योंकि इसके चलते बड़ी दवा कंपनियों का नुकसान हो रहा है। इन कानून के चलते उन बड़ी कंपनियों को कारोबार करने की इजाजत नहीं है जो दवाईयों के घटक में मामूली बदलाव करके बाज़ार में जेनेरिक दवाईयों को पहुंचने नहीं देते।

केरी ने इन मसले पर कहा, "अगर मोदी सरकार सख़्त बौद्धिक संपदा अधिकार को लागू करना चाहती है, तो मेरा यकीन करिए, ज़्यादा अमेरीकी कंपनी भारत का रूख करेंगी।"

विज्ञापन

मज़बूत मोदी का भरोसा

केरी ने लगभग चेतावनी भरे लहजे में कहा, "भारत को नियम आधारित कारोबारी व्यवस्था का समर्थन और अपने दायित्वों को पूरा करना चाहिए।" साफ़ है कि अमेरिका चाहता है कि मोदी सरकार विश्व व्यापार संगठन के व्यापार सुविधा समझौते पर 31 जुलाई तक हस्ताक्षर कर दे। केरी ने कहा, "इससे अमेरीका सहित दुनिया के दूसरे हिस्सों से भारत में निवेश बढ़ेगा।"

केरी यात्रा के दौरान इन मसलों पर भारत से रियायत हासिल करने की भूमिका तैयार करेंगे। अमेरीकी प्रशासन को यह भ्रम है कि मज़बूत मोदी सरकार के सामने आण्विक और पेटेंट के क्षेत्र में उस तरह की अड़चनें नहीं होंगी जैसी मनमोहन सिंह के सामने थीं। हालांकि हकीकत यह है कि प्रधानमंत्री अगर इन मुद्दों पर समझौता करते हैं तो उनकी छवि का नुकसान होना तय है।

इन सबके अलावा केरी दूसरे मुद्दों पर भी बोले, जिसमें अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में आपसी सहयोग, उच्च शिक्षा और व्यवहारिक प्रशिक्षण में सहयोग, मध्य और दक्षिण एशिया के बीच जुड़ाव और इंडो पैसेफिक आर्थिक कॉरीडोर बनाने की बात भी कही जिसमें अमेरीका और भारत साथ मिलकर काम कर सकें।

इसके अलावा राष्ट्रपति चुनाव के विवादास्पद दूसरे दौर से पहले राजनीतिक और सुरक्षा के नजिरए से बेहद अनिश्चित अफ़गानिस्तान के मुद्दे पर सहयोग की बात भी शामिल है। भारत और अमेरिका के साझा हित में यह सुनिश्चित करना है कि अफ़ग़ानिस्तान अस्थिर ना हो।

भारत के साथ संबंधों को बेहतर बनाने पर अमरीका सीमित आर्थिक फ़ायदा हो सकता है- हथियारों की डील हो सकती है, परमाणु ऊर्जा संयंत्र का ठेका मिल सकता है

लेकिन केरी और उनके साथियों का ध्यान अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर टिकाऊ पहल शुरू करने में ज्यादा होगी जिससे अफ़ग़ानी सरकार को पर्याप्त वित्तीय और सैन्य मदद

मिल सके और इससे पड़ोसियों की सकारात्मक भूमिका भी सुनिश्चित होगी।

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें