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पाकिस्तान और चीन से कैसे निपटेंगे मोदी?

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हाल में संपन्न हुए चुनावों में भारत के चुनावों में विदेश नीति के मुद्दे ज्यादा चर्चा में नहीं रहे, भारतीय जनता पार्टी के नेता नरेंद्र मोदी ने अपनी ज्यादातर रैलियों और भाषणों में सुशासन और आर्थिक विकास पर जोर दिया।
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कुछ ही मौकों पर उन्होंने चीन, पाकिस्तान या बांग्लादेश का जिक्र किया।

जब उन्होंने जिक्र किया, तब भी उनके बयान साफ और कडे थे। उन्होंने कश्मीर में सीमा पर होने वाली झडपों का मजबूती से जवाब न देने के लिए कांग्रेस की अगुआई वाले यूपीए यानी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की आलोचना की और चीन को चेतावनी दी कि भारत अपनी क्षेत्रीय संप्रुभता की रक्षा करेगा।

इन मुद्दों के अलावा उन्होंने बांग्लादेश से गैर कानूनी तौर पर आने वाले लोगों को लेकर भी आपत्ति जाहिर की।

इन बेहद भावनात्मक मुद्दों के अलावा उन्होंने विदेश नीति को लेकर सिर्फ एक बार बात की, जब उन्होंने जापान की तारीफ की और भारत की आर्थिक विदेश नीति को मजबूत करने के संदर्भ में जापान से रिश्तों को मजबूत करने की जरूरत बताई थी।
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इस वक्त, मोदी की विदेश नीति की संभावित दिशा को समझने के लिए यही बयान और टिप्पणियां उपलब्ध हैं।

जब तक वो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश मंत्री जैसे पदों को लेकर अपनी पसंद नहीं बता देते हैं तब उनकी विदेश नीति की प्राथमिकता को लेकर कुछ और अनुमान लगाए जा सकते हैं।

आर्थिक विदेश नीति'

अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में मोदी की दिलचस्पी को देखते हुए ये कहना गलत नहीं होगा कि आर्थिक विदेश नीति उनकी प्रमुख प्राथमिकताओं में से एक होगी।

हालांकि चीन के साथ व्यापार के मुद्दे अहम रहेंगे, इसकी संभावना है कि मोदी सीमा विवाद को लेकर कडा रुख अपनाएंगे।

संभावना है कि वो दक्षिण-पूर्व एशिया और जापान से रिश्ते मजबूत करने पर ध्यान देंगे। इसके अलावा संभावना है कि वो अफ्रीका में भारत के व्यापारिक हितों को प्रोत्साहित करेंगे और अगले जी-20 शिखर सम्मेलन में भी इसे बढावा देंगे।

इसके अलावा, ये अटकलें लगाना भी पूरी तरह से तर्कसंगत होगा कि, सीमाओं के अंदर, वो प्रमुख यूरोपीय देशों से विदेशी निवेश को भी लुभाएंगे।

हालांकि जो बात अनिश्चित है वो ये कि मोदी अमरीका से किस तरह निपटेंगे।

ये मामूली सवाल नहीं है: अमरीका अभी भारत से कई तरह के व्यापार विवादों में उलझा हुआ है, भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागडे की गिरफ्तारी के बाद से दोनों देशों की राजधानियों में एक दूसरे के लिए माहौल अच्छा नहीं है और इन सबके अलावा ये भी स्पष्ट नहीं दिखता कि आगे बढकर मोदी तक पहुंचने की अमरीका की कोशिशें कितनी कामयाब हुई हैं।

वीजा देने से इनकार...

जितना पता है वो ये है कि साल 2005 में अमरीका के वीजा देने से इनकार करने से मोदी गंभीर रूप से आहत हैं। अमरीका ने साल 2002 में गुजरात में हुए दंगों के दौरान मोदी के व्यवहार की वजह से उन्हें वीजा देने से इनकार किया था। इन दंगों में 1,000 से ज्यादा लोग मारे गए थे जिनमें से ज्यादातर मुसलमान थे।

मोदी ने हमेशा आरोपों से इनकार किया है और उन पर किसी तरह का मामला दर्ज नहीं है।

व्यापारिक और निवेश संबंधी मामलों में अमरीका की अहमियत को देखते हुए ये अनुमान लगाया जा सकता है कि आने वाले वक्त में मोदी अपनी खीझ से उबरेंगे और अमरीका के साथ मिलकर काम करेंगे।

हालांकि ये संभव है कि वो ये संबंध बढाने के अमरीका के इशारों का जवाब देने में कोई खास जल्दबाजी दिखाने की पहल न करें।

कडा रुख?

भारत के अहम पडोसियों जैसे चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान से उसके संबंध कैसे होंगे? ये सभी देश अलग-अलग स्तर पर भारत से चिढे हुए हैं।

इन मसलों पर एक स्पष्ट आकलन किया जा सकता है।

हालांकि चीन के साथ व्यापार के मुद्दे अहम रहेंगे, इस बात की संभावना है कि वो चीन के साथ सीमा विवाद में कडा रुख अपनाएंगे, रक्षा खर्च में बढोतरी करेंगे और हिमालयी सीमा पर होने वाली 'घुसपैठ' को कम बर्दाश्त करेंगे।

उनका कडा रुख उनके उन समर्थकों के उस अहम हिस्से को अपील करेगा जो महसूस करता है कि भारत को अपने झगडालू और दबंग पडोसियों के सामने मजबूती से खडा होने की जरूरत है।

इसी तरह से, इस बात की भी संभावना है कि अगर भारत की धरती पर हुए किसी भी हमले के तार स्पष्ट तौर पर पाकिस्तान से जुडे दिखाई देते हैं तो वो पाकिस्तान को साफ चेतावनी देने से नहीं हिचकिचाएंगे।\

उनको सुरक्षा और विदेश नीति के मसलों पर सलाह देने वाले कई लोग पाकिस्तान को संबंध में अपने तेजतर्रार विचारों के लिए जाने जाते हैं।

इसके अलावा, भारतीय जनता का एक बडा हिस्सा, वो उनके समर्थक हों या न हों, इस बात से हताश है कि भारत उकसावों और चरमपंथी हमलों का जवाब देने में अक्षम है।
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'भारत जवाब देने में ढीला'

क्या उनका काम बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों के आने के विवादास्पद मुद्दे पर उनकी बातों जैसा ही होगा?

वो इस तरह के प्रवास को रोकने के लिए कडी नीतियां अपना सकते हैं।

हालांकि भारत के संघीय ढांचे की वजह से उन्हें ये जल्दी ही पता चल जाएगा कि नई नीतियां राज्यों के क्षत्रपों पर निर्भर करेंगी, जो अपने विशेषाधिकारों को गंभीरता से लेते हैं।

ऐसा होने की सबसे ज्यादा संभावना पश्चिम बंगाल में है, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केंद्र सरकार की नीतियों पर ज्यादा ध्यान नहीं देने के लिए जानी जातीं हैं।

मोदी अपनी ज्यादातर ऊर्जा और कोशिशें घरेलू राजनीति पर लगा सकते हैं लेकिन वो जल्दी ही ये सीखेंगे कि दुनिया उनके एजेंडा में अपने तरीके से दखल दे सकती है।

वो इन मसलों से कैसे निपटेंगे इससे उनकी राष्ट्रीय और संभवत: अंतरराष्ट्रीय काबिलियत की परख होगी।

(सुमित गांगुली अमरीका के ब्लूमिंगटन की इंडियाना यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर हैं।)

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