भाजपा के ‘पितामह’ लालकृष्ण आडवाणी अब पार्टी में रहकर हाशिये की राजनीति करेंगे।
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की ताजपोशी के तत्काल बाद लेटर बम फोड़कर आडवाणी ने इसके साफ संकेत दे दिए।
साथ ही स्पष्ट कर दिया है कि निकट भविष्य में वह पार्टी और मोदी के सामने मुसीबतें खड़ी करते रहेंगे। वह मोदी के खिलाफ अपने विरोध को और मुखर करने के लिए फिर से पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे सकते हैं।
दरअसल मोदी का विरोध कर आडवाणी पिछले कुछ सालों में बनाई गई अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को और मजबूत करना चाहते हैं।
उन्हें लगता है कि चुनाव के बाद अगर पार्टी को सरकार बनाने के लिए सहयोगियों की जरूरत पड़ी तो वह फिर मजबूत दावेदारी जता सकते हैं।
हालांकि आडवाणी के इस रुख के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ बेहद नाराज है। मगर पार्टी और संघ नेतृत्व उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।
पीएम उम्मीदवार तय करने में खुद को पूरी तरह से दरकिनार किए जाने के बाद आडवाणी ने भी स्वयं को नई भूमिका के लिए तैयार कर लिया है।
अब वह लगातार पार्टी के विभिन्न फैसलों पर टीका टिप्पणी कर मुश्किलें खड़ी करते रहेंगे। उनके नजदीकी नेताओं का कहना है कि पहले भी मोदी के सवाल पर पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देने वाले आडवाणी दोबारा भी ऐसा कर सकते हैं।
इन नेताओं का कहना है कि अगर इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी को सफलता नहीं मिली तो आडवाणी के विरोध को बल मिलेगा। वैसे भी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पहले ही इस बारे में पार्टी और संघ नेतृत्व को चेता चुके हैं।
हालांकि आडवाणी के मुखर विरोध से संघ और भाजपा नेतृत्व हतप्रभ होने के साथ-साथ बुरी तरह खफा भी है। मगर जहां तक कार्रवाई की बात है इस मामले में संघ और भाजपा नेतृत्व ऊहापोह में है।
पार्टी अपने पितामह के खिलाफ कार्रवाई करने का साहस नहीं जुटा पा रही है। ऐसा करने पर जहां पार्टी की चुनावी रणनीति पटरी से उतर जाएगी और अगर ऐसा नहीं किया गया तो आडवाणी मोदी और पार्टी पर लगातार हमला कर विरोधियों को भरपूर मसाला उपलब्ध कराते रहेंगे।
इस स्थिति पर पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि आडवाणी पार्टी के एक ऐसे बरगद हैं जिसके नीचे कई पौधे और पेड़ उगे। मगर अब बूढ़ा बरगद किसी भी कीमत पर मोदी के रूप में एक नए बरगद को उगने नहीं देना चाहता।