महात्मा गांधी नरेगा के चलते खेती-किसानी कार्यों के लिए अब मजदूरों की किल्लत होने लगी है।
कृषि मंत्रालय ने इस समस्या को स्वीकार करते हुए कहा कि फसलों की बुवाई व कटाई के समय किसानों को श्रमिकों की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
यही नहीं मनरेगा के कारण मजदूरी दरों में भी खासी बढ़ोतरी हुई है। इसके कारण कृषि उत्पादों की लागत पर सीधा असर पड़ रहा है।
लोकसभा में मंगलवार को एक लिखित प्रश्न के जवाब में कृषि राज्यमंत्री तारिक अनवर ने बताया कि मनरेगा का सीधा दुष्प्रभाव खेती पर दिखने लगा है। एक सर्वेक्षण में यह तथ्य सामने आया है।
हालांकि मनरेगा से कई फायदे भी हुए हैं, जिसमें कृषि उत्पादकता में सुधार प्रमुख रूप से है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा कार्यों से भू-जल में भी खासा सुधार हुआ है।
मगर दूसरी ओर इस योजना का विपरीत असर ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों की कमी के रूप में भी दिख रहा है। मनरेगा के कारण श्रमिक मजदूरी को लेकर मोल भाव भी करने लगे हैं।
उन्होंने बताया कि मनरेगा के क्रियान्वयन से श्रमिकों में प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हुई है। इसके कारण कृषि कार्यों खासकर बुवाई और कटाई के समय न सिर्फ श्रमिकों की कमी रहती है बल्कि जो श्रमिक मिलते हैं, वह अधिक मजदूरी की मांग करते हैं।
ऊंची मजदूरी दरों का असर कृषि उत्पादों की लागत पर पड़ रहा है। हालांकि सबसे ज्यादा अच्छी बात यह हुई है कि गांव से गरीबों का पलायन रुका है क्योंकि मनरेगा से उन्हें गांव में ही रोजगार मिल रहा है।
वहीं पिछले वर्ष मनरेगा में कुछ कृषि कार्यों को जोड़े जाने से छोटे किसानों को फायदा हो सकता है। मनरेगा के तहत सिंचाई सुविधा, फार्म तालाब की खुदाई, बागवानी, पौध-रोपण, जैविक खाद का निर्माण के अलावा पशुधन से संबंधित कार्य भी हो सकेंगे।