शौहर के इंतकाल के बाद अब महविश को हकीम की कब्र पर भी आंसू बहाने के लिए इजाजत लेनी पड़ेगी। गांवों के तुगलकी फरमान के कारण भाटगढ़ी के लोगों को पड़ोसी गांव में बने कब्रिस्तान में जाने की इजाजत नहीं है। इंतकाल के बाद दफनाने के लिए उस गांव के लोगों की मंजूरी जरूरी है। कब्रिस्तान पर अवैध कब्जा है। शासन के सख्त आदेश के बाद भी प्रशासन ने इस ओर ध्यान नहीं दिया है।
अब्दुल हकीम के भाई मोहम्मद यूनुस ने बताया कि उनके वालिद अब्दुल हाफिज के इंतकाल के समय कब्रिस्तान में दफनाने को लेकर काफी विवाद हुआ था। जनाजे को पुलिस सुरक्षा में दफनाया गया था। उन्होंने बताया कि भाटगढ़ी के लोगों को कब्रिस्तान में जाने की इजाजत नहीं हैं। इसके लिए परमिशन लेनी पड़ती है। भाटगढ़ी के लोगों ने जब इसका विरोध किया तो गांव के लोगों ने साफ कह दिया कि अपना कब्रिस्तान अलग बनाओ। ऐसे में परिवार के लोग हकीम की कब्र पर कैसे जाएंगे।
गांव के जुनैद ने बताया कि पिछले 50 साल से चकबंदी नहीं हुई है। सरकारी संपत्तियों पर लोगों ने अवैध कब्जा कर रखा है। कब्रिस्तान की जमीन पर चहारदीवारी नहीं है।
एसडीएम सदर संदीप कौर ने कहा कि कब्रिस्तान की चहारदीवारी के लिए लेखपाल से जांच कराई जाएगी। कब्रिस्तान में जाने के लिए यदि इजाजत लेनी पड़ती है तो यह गंभीर विषय है। इसकी जांच कर रिपोर्ट डीएम को सौंपी जाएगी।
गौरतलब है कि अब्दुल हकीम की हत्या महविश के चाचा सलमान ने कर दी थी। अब्दुल हकीम का गुनाह ये था कि उसने गांव की महविश से प्यार किया और बिरादरी और समाज की बंदिशों को पार कर उससे शादी कर ली थी।