फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

दुनिया से रुखसत हुए मौलाना मुफ्ती कामिल, उमड़ा जनसैलाब

विज्ञापन
विज्ञापन
इस्लामिक जगत की महान हस्ती हजरत मौलाना मुफ़्ती कामिल साहब का लंबी बीमारी के चलते बुधवार को इंतकाल हो गया। लाखों लोग उनकी आखिरी जियारत के लिए पहुंचे और उनकी ईदगाह स्थित मदरसे में नमाज-ए-जनाजा में शरीक हुए। हर कोई हजरत के जनाजे को कंधा देने के लिए परेशान था। जमीयत-उलेमा-ए -हिंद के मौलाना महमूद मदनी समेत कई इस्लामिक और राजनैतिक हस्तियां शरीक हुईं।
विज्ञापन


82 वर्षीय मौलाना कामिल का बुधवार की सुबह छह बजे मेरठ के एक नर्सिंग होम में इंतकाल हुआ। यह खबर जैसे ही कस्बे में पहुंचा तो मातम छा गया। कस्बे के अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान, दुकानें बंद करके उनके घर पहुंचना शुरू हो गए। सुबह नौ बजे उनका जनाजा मोहल्ला गुजरान स्थित उनके निवास पर पहुंचा जहां उनकी जियारत करने के लिए लोगों की भीड़ इक्ट्ठा होनी शुरू हो गई। भारी भीड़ को देखते हुए उनके जनाजे को लोगों की जियारत कराने के लिए ईदगाह ले जाया गया। दोपहर में जौहर की नमाज अदा करने के बाद मौलाना कामिल साहब के जनाजे की नमाज हजरत मौलाना मुफ्ती इफ्तेखारुल हसन साहब ने अदा कराई।

नमाज अदा करने के बाद उनके जनाजे को सुपुर्द ए खाक करने के लिए मौलाना की वसीयत के मुताबिक नेशनल इंटर कॉलेज के पीछे स्थित उनके बाग में ले जाया गया। जहाँ पर लाखों लोगों ने नम आंखों से उनके जनाजे को सुपुर्द ए खाक किया। जिस वक्त मौलाना के जनाजे को सुपुर्द ए खाक करने के लिए कब्र में रखा गया तो वहां पर कब्र से निकली मिट्टी गायब थी। जिसको लोगों ने कब्र बनाते समय ही अकीदत के तौर पर लेकर चले गए थे। बाद में यह मिट्टी लोगों ने वापस कब्र में डाल दी।
विज्ञापन

विज्ञापन

इल्म के दरिया, कौम के रहनुमा थे मौलाना

मौलाना कामिल साहब कांधला के एक जमींदार परिवार में सन् 1933 में पैदा हुए। उनके वालिद का नाम मुशर्रत जंग था जो पूर्व सांसद शफक्कत जंग के परिवार से संबंधित थे। मौलाना साहब की बचपन से ही दीनी तालीम में दिलचस्पी थी। उन्होंने दारुल उलूम देवबंद से सन् 1952 में मौलाना की उपाधि हासिल की थी। उसके बाद उन्होंने गांव टपराना की जामा मस्जिद में इमामत की। उसके बाद गांव गढ़ी दौलत के कुछ जिम्मेदार लोग उनको गढ़ी दौलत मदरसे में ले आए।

उसके बाद उन्होंने ग्राम गढ़ी दौलत को अपना कार्य स्थल चुना जहां पर उन्होंने सन् 1962-63 में गांव स्थित मदरसा जामिया बदरूल उलूम को आगे बढ़ाया और अपनी मेहनत से मदरसे को ऐसा संजो दिया कि उसमें हर साल हजारों बच्चे हाफिज बनते हैं। मौलाना कामिल साहब हिंदू मुस्लिमों में अत्यंत लोकप्रिय थे। उन्होंने अपना जीवन बेहद सादगी के साथ बिताया। लोगों को आडंबरों से बचने की नसीहत दिया करते थे।

मौलाना कामिल साहब की ख्याति इस प्रकार फैली थी कि वह हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे और दूर दूर से दोनों वर्गों के लोग उनके पास दुआ कराने के लिए पहुंचते थे और सभी को बराबर का सम्मान दिया जाता था। वह कभी किसी से भेदभाव नहीं रखते थे और सभी को अपने अपने धर्मों का पालन करने व इंसानियत की परिभाषा दिया करते थे। वह आडंबरों में विश्वास नहीं रखते थे। वह दोनों वर्गों को एक ही बात कहते थे कि हम सब ऊपर वाले के बंदे हैं और कोई किसी रूप में ईश्वर को मानता है और कोई किसी रूप में मानता है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें