आजादी की वर्षगांठ के मौके पर प्रधानमंत्री को सीधे चुनौती देने के बाद ‘मनमोहन बनाम मोदी’ में आखिर कौन बेहतर की बहस तेज हो गई है। 15 अगस्त के मौके पर नरेंद्र मोदी की ओर से जनता से जुड़े मुद्दे छेड़ने से कांग्रेस स्तब्ध है।
सरकार और कांग्रेस की फौज मोदी पर पलटवार करने में जुट गई है। मोदी के मुकाबले मनमोहन सिंह को बेहतर साबित करने में सरकार और कांग्रेस की मशीनरी लग गई है।
आंकड़ों की बाजीगरी हो या फिर जुबानी तीरों की बौछार। सत्तापक्ष के मैनेजरों में मोदी के खिलाफ हर एक दांव को इस्तेमाल करने की होड़ मच गई है।
आजादी के बाद शायद यह पहला मौका होगा, जब किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को चुनौती देकर उसे बौना साबित करने की कोशिश की हो। मोदी ने बाकायदा एक दिन पहले ही कह दिया था कि 15 अगस्त को पूरा देश उनके भाषण से प्रधानमंत्री के लाल किले से दिए संबोधन की तुलना करेगा।
मोदी के एक दिन पहले ऐलान करने के बावजूद भी केंद्र और सरकार जोरदार तरीके से मुकाबला नहीं कर पाई। मीडिया की सुर्खियां में ‘नमो नमो’ की छाप को देखने के बाद ही सरकार और पार्टी पूरी तरह सक्रिय हो पाई है।
फिर भी पार्टी के नेता दबी जुबान में यह बात मान रहे हैं कि गुजरात के मुख्यमंत्री ने आजादी के दिन महंगाई, भ्रष्टाचार, विदेश नीति और आर्थिक मोर्चे पर कई ऐसे सवाल छेड़ दिए है, जो कि सीधे जनता को छू सकते हैं।
लिहाजा, मोदी की इस कोशिश पर पानी फेरने के लिए पार्टी और सरकार की ओर से हमले तेज करने की रणनीति पर ही सबसे पहले काम करने पर विचार किया गया है।