अमूमन अपराध को अदालत में साबित करने के लिए चश्मदीद साक्ष्य पर ही निर्भरता होती है। एस मंजुनाथ हत्याकांड के मामले में पुलिस के पास घटना का कोई चश्मदीद साक्षी भी नहीं था, लेकिन कहावत है कि हर अपराधी अपने पीछे सबूत छोड़ता है बस जरूरत है उन सबूतों को खोजने की।
इस केस में भी परिस्थितियों ने ऐसा ही कुछ साबित किया। पुलिस ने अपनी पड़ताल में हर उस पहलू को जांचा-परखा जहां से अपराधियों तक पहुंचा जा सके। उस वक्त माहौल ऐसा था कि कोई चश्मदीद सामने नहीं आ रहा था।
पर जांच की शुरुआत में ही कई ऐसे हालात मिलते रहे जिससे पड़ताल सही दिशा में बढ़ गई। मसलन मंजुनाथ ने कुछ दिन पहले ही मोनू मित्तल के पेट्रोल पंप पर घटतौली पकड़ी थी। इस पर वहां उनका विवाद भी हुआ था। इसी तरह कई दूसरे साक्ष्य भी मिले जिसने अपराधियों की करतूत उजागर की।
इन पांच हालातों ने बयां की हकीकत
1. घटना के कुछ दिनों पूर्व ही मोनू मित्तल के पेट्रोल पंप पर आईओसी के अफसर एस मंजुनाथ ने घटतौली पकड़ी थी।
2. मंजुनाथ के शव के साथ जिन व्यक्तियों को पकड़ा गया वह पवन मित्तल के साथ अपराध के आरोपी थे।
3. मंजुनाथ के शव में जिस पिस्टल की काटेज पाई गई उसी काटेज के खोखे पेट्रोल पंप के भीतर पेट्रोल टैंक में पाए गए, बैलेस्टिक रिपोर्ट ने भी इस पर मुहर लगाई।
4. खून की छीटे जिस कपड़े से साफ किए गए, वह भी हत्यारोपियों के पास से बरामद हुआ।
5. एस मंजुनाथ के मोबाइल व उनकी गाड़ी अभियुक्तों के साथ ही बरामद हुई। मोबाइल काल की डिटेल और जीपीआरएस लोकेशन ने अपराधियों की लोकेशन और बातचीत को एक दूसरे के बीच साबित किया।
हर स्तर पर बरती गई सतर्कता
तत्कालीन जिला शासकीय अधिवक्ता चंद्रमोहन सिंह बताते हैं कि पुलिस की केस डायरी को आधारशिला के रूप में स्थानीय न्यायालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक विचार करता है। इस मामले में भी तफ्तीश के दौरान केस डायरी कोर्ट में जमानत अर्जी के विरोध के लिए केस डायरी मंगवाई गई और सीलबंद कर दिया गया, जिससे सूचनाएं लीक नहीं हो सकीं, जिसका लाभ मुल्जिम नहीं ले पाए और उन्हें सजा दिलाने में आसानी हुई।
पेशी से पहले होता था कड़ा होमवर्क
सहायक अभियोजन अधिकारी और मंजूनाथ हत्याकांड के अभियोजन को साबित करने के लिए अलग से जिम्मेदारी निभाने वाले कौशल किशोर बताते हैं कि हत्याकांड के कवरेज को लेकर जिस तरह मीडिया में उत्सुकता थी, उससे कहीं बढ़कर अभियोजन के लिए चुनौती थी क्योंकि केस को अदालत में साबित करने के लिए कोई चश्मदीद साक्षी नहीं था। लिहाजा परिस्थितियों की सभी कड़ियों को सिलसिलेवार अदालत में साबित करना था।
लिहाजा हम हरेक पेशी से एक दिन पहले ही कड़ा होमवर्क करते थे। सभी आरोपियो को सजा मिलने के बाद भी हमारी मेहनत जारी रही सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता आईबी सिंह के निकट संपर्क में रहे, उन्हें केस की सुनवाई के दौरान हरेक बारीक बातों पर अवगत कराते रहे।
ये रहे अभियोजन के किरदार
जिला न्यायाधीश एसएमए आब्दी की कोर्ट में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता कामिनी जायसवाल, हाईकोर्ट के आईबी सिंह, सिविल कोर्ट के डीजीसी चंद्रमोहन सिंह, एडीजीसी कौशल किशोर, वरिष्ठ अधिवक्ता जेपी उपाध्याय, आईबी सिंह की सहायता के लिए प्रशांत सिंह अटल।
कब क्या हुआ
19 नवंबर 2005 : गोला गोकर्णनाथ स्थित मित्तल पेट्रोल पंप पर आईओसी अफसर एस मंजूनाथ की गोली मार कर हत्या।
19/20 नवंबर की रात : सीतापुर की थाना महोली पुलिस ने शव को दो हत्याभियुक्तों के कब्जे से बरामद किया।
26 मार्च 2007 : जिला जज एसएमए आब्दी ने आरोपी मोनू मित्तल को फांसी और देवेश अग्निहोत्री, राकेश आनंद, विवेक शर्मा, शिवेश गिरि, राजेश वर्मा और हरीश मिश्र और संजय अवस्थी कोर्ट को उम्रकैद की सजा सुनाई।
11 दिसंबर 2009 : हाईकोर्ट ने मुख्य आरोपी पवन मित्तल की फांसी की सजा उम्रकैद में बदली। अन्य हत्याभियुक्त देवेश अग्निहोत्री, राकेश आनंद, विवेक शर्मा, शिवकेश गिरि, राजेश वर्मा को उम्रकैद की सजा बरकरार रखी, जबकि हरीश मिश्र और संजय अवस्थी को बरी कर दिया।
11 मार्च 2015 : सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खीरी कचहरी में भी हलचल
आईओसी अफसर एस मंजूनाथ हत्याकांड के आरोपियों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखे जाने सुप्रीम कोर्ट की भी मुहर लग गई। सुप्रीम कोर्ट के फैसले की जानकारी लगते ही कचहरी परिसर में वकीलों और आम वादकारियों के बीच एक बार फिर पुरानी यादें ताजा हो गईं।
अपनी ड्यूटी और ईमानदारी के पाबंद एस मंजूनाथ के हत्याभियुक्तों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से एक बार फिर हत्याकांड की यादें ताजा हो गई हैं। 19 नवंबर 2005 को गोला कस्बे में स्थित पवन मित्तल के पेट्रोल पंप पर पेट्रोल की गुणवत्ता और सही माप तौल की चेकिंग करने आए आईओसी के अफसर की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। स्थानीय पुलिस ने पहले तो अपने ही अंदाज में इसे ठंडे बस्ते के हवाले करने की कोशिश की लेकिन मीडिया के जोर पकड़ने के बाद राजधानी के अफसर भी इसे लेकर संजीदा हो गए, यहीं कारण है कि खीरी की पुलिस ने यू टर्न ले लिया। अब पुलिस की सक्रियता परिस्थितिजन्य साक्ष्य जुटाने में और तफ्तीश के उन पहलुओं को भी जांचने परखनें में जुट गई जो अमूमन नहीं जुटाए जाते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय का फैसला सराहनीय
भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष समिति के संयोजक और बार कौंसिल ऑफ यूपी के पूर्व चेयरमैन अजय शुक्ला कहते हैं कि भ्रष्टाचार करने वालों के खिलाफ जिस तरह न्यायिक दृष्टिकोण पैना हुआ है वह स्वागत योग्य है। अपने भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए एक ईमानदार अधिकारी की निर्मम हत्या निंदनीय है। हत्याकांड पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सराहनीय है।