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जानिए निर्मला ने क्यों छोड़ दिया मंगलसूत्र पहनना?

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चेन्नई में द्रविदार कड़गम संगठन के एक कार्यक्रम में 20 महिलाओं ने अपना मंगलसूत्र हमेशा के लिए उतार देने का कदम उठाया। संगठन के इस कदम का ऐलान होने के बाद विरोध भी हुआ था। बी.एच. निर्मला उन 20 महिलाओं में शामिल थीं जिन्होंने मंगलसूत्र उतारने का फ़ैसला किया था। उन्हीं के शब्दों में पढ़िए कि उन्होंने ऐसा क्यों किया।
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दासता का प्रतीक
मेरी शादी 10 साल पहले हुई थी। मेरे पति ने तो तभी कहा था कि ताली (यानि मंगलसूत्र) पहनने की कोई ज़रूरत नहीं है। पर परिवार का दबाव था और मुझे इतनी समझ नहीं थी। तभी से मंगलसूत्र पहन रही हूं। पर समय के साथ मेरी सोच बदली। मेरे मन में ये सवाल उठा कि जब आदमी शादीशुदा होकर कोई ऐसा आभूषण नहीं पहनते तो औरतें क्यों पहनें?

फिर मंगलसूत्र मुझे औरतों को दबाने का प्रतीक लगने लगा। आप कहेंगे की ये सिर्फ़ एक धागा है, पर ये बहाना है औरतों पर तरह-तरह के दबाव बनाने का, उन्हें दास जैसा महसूस कराने का। आदमी से कम होने के एहसास की शुरुआत मंगसूत्र और मेट्टी (यानि बिछिया) से ही शुरू होती है। वर्ना आदमी भी ऐसी चीज़ें पहनने को मजबूर किए जाते।
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'विरोध तो होता ही है'

शादी ऐसे दिखावे से नहीं चलती। प्यार के बल पर ही दो लोगों का लंबा साथ खुशी से पूरा होता है। हो सके तो पति और पत्नी को एक दूसरे को ईमानदारी का तोहफ़ा देना चाहिए, वही सबसे सुंदर तोहफ़ा है।

मैं एक निजी कंपनी में सुपरवाइज़र का काम करती हूं। मंगलसूत्र उतारने का फ़ैसला मैंने बहुत सोच-समझ कर लिया। अब मैं उसे दोबारा नहीं पहनूंगी। आदमी और औरत के संबंधों के बारे में मेरी यह समझ हमारे विचारक और समाजसेवी पेरियार के लेख पढ़ने से विकसित हुई।

मेरा सात साल का बेटा और आठ साल की बेटी है। मैं उन्हें अभी से इन विचारों की समझ दे रही हूं, ताकि बड़े होकर वे भी पुरानी मान्यताएं छोड़ दें। समाज शुरुआत में ऐसी सोच का विरोध ही करता है। पर समाज में बदलाव लाना कब आसान रहा है, समय के साथ वह इसे स्वीकार कर लेगा।
(बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य से बातचीत पर आधारित)
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