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ममता को यूपीए से 3 माह में मिली तीसरी मात

Sat, 22 Sep 2012 01:44 AM IST
नई दिल्ली/संजय मिश्र
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ममता बनर्जी ने वामपंथियों के अभेद्य सियासी किले को ध्वस्त कर खुद को बंगाल की शेरनी साबित किया हो, मगर केंद्र की सियासत में उनका अब तक का हर दांव लगभग उल्टा पड़ा है। यूपीए के साथ इस जंग में ममता की दहाड़ से समय-समय पर राजनीतिक तापमान बेशक बढ़ा हो, मगर बाजी कांग्रेस के पक्ष में रही है।
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तृणमूल कांग्रेस के समर्थन वापस लेने के बाद भी यूपीए सरकार की सेहत पर खास फर्क नहीं आना, दीदी की शिकस्त ही मानी जाएगी। पिछले तीन महीने में ममता को यूपीए की यह तीसरी सियासी मात है। इससे पहले पश्चिम बंगाल को विशेष वित्तीय पैकेज देने पर तमाम दबावों के बावजूद ममता को कुछ हाथ नहीं लगा, तो प्रणब मुखर्जी की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के खिलाफ ममता द्वारा विद्रोह का बिगुल बजाना भी बेकार गया।

यूपीए-दो सरकार और ममता के बीच प्रेम और टकराव की यह सियासत बीते एक साल से चल रही थी। जब पिछले साल नवंबर में कैबिनेट ने रिटेल एफडीआई का फैसला कर लिया था। तब ममता के विरोध की वजह से सरकार ने आम सहमति बनने तक कैबिनेट के फैसले को स्थगित रखने का ऐलान किया था। मगर इस टकराव ने जंग का रूप बीते जून-जुलाई में लिया, जब राष्ट्रपति चुनाव की आहट देख दीदी ने पश्चिम बंगाल के लिए करीब 25 हजार करोड़ का आर्थिक पैकेज मांगा और लिए तमाम दबाव भी डाले।
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पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री अमित मित्रा को दीदी ने दो बार तत्कालीन वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के साथ बैठक के लिए भेजा। मगर प्रणब और यूपीए सरकार ने ममता की बात नहीं मानी। इससे आहत ममता ने घायल शेरनी की तरह राष्ट्रपति चुनाव की उम्मीदवारी के शुरुआती दौर में मुलायम सिंह के साथ मिलकर यूपीए सरकार की नाव को बुरी तरह झकझोर दिया। मगर सियासी ऑपरेशन से राजनीतिक दिशा मोड़ने में माहिर कांग्रेस ने रातोंरात मुलायम को अपने पाले में लाकर ममता को बिल्कुल अलग-थलग कर दिया।

क्रोधागिभन में ममता ने पहले तो प्रणब की उम्मीदवारी का विरोध किया। मगर अकेले पड़ चुकीं दीदी को हार का कड़वा घूंट पीते हुए प्रणब मुखर्जी के पक्ष में वोट देना पड़ा, क्योंकि मां, माटी-मानुष की राजनीति की बात करने वाली दीदी के लिए एक भद्र बंगाली का राष्ट्रपति बनने का विरोध करना मुश्किल था।

हालांकि राष्ट्रपति चुनाव के बाद कांग्रेस ने ममता के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए यूपीए समन्वय समिति जरूर बना दी। इसकी दो बैठकें भी हुईं मगर एफडीआई रिटेल से लेकर आर्थिक सुधारों के अन्य मुद्दों पर चर्चा आगे नहीं बढ़ी। अचानक पिछले एक हफ्ते में ही एफडीआई रिटेल न केवल कैबिनेट से मंजूर हुआ बल्कि सरकार ने इसे लागू भी कर दिया।

यानि करीब सवा तीन साल तक यूपीए का समर्थन कर रही तृणमूल कांग्रेस को उनके सभी अहम सियासी एजेंड़ों पर यूपीए ने बीते तीन महीने के दौरान एक-एक कर ऐसी मात दी कि ममता को यूपीए से बाहर जाने के सिवाय कोई दूसरा रास्ता नजर नहीं आया। वैसे यह भी हकीकत है कि केंद्र के जिस राजनीतिक गठबंधन में भी ममता रहीं उसमें सरकार का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन्होंने गठबंधन छोड़ा है। इससे पहले वाजपेयी सरकार में ममता एनडीए के साथ थीं मगर सरकार का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन्होंने एनडीए छोड़ दिया था।
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