प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस मेक इन इंडिया के जरिए देश की तस्बीर बदलने की बात कर रहे हैं उस उद्योग महोत्सव के आयोजन को जोर का झटका लगा है। बांबे हाईकोर्ट ने गिरगांव चौपाटी पर कार्यक्रम की अनुमति देने से मना कर दिया है। इससे सरकार की परेशानी बढ़ गई है।
देश की औद्योगिक शक्ति दिखाने के लिए आगामी 13 से 15 फरवरी के दरम्यान मुंबई के गिरगांव चौपाटी पर मेक इन इंडिया सप्ताह का आयोजन किया गया है। इस कार्यक्रम का शुभारंभ स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करने वाले हैं। उद्योग विभाग के मुताबिक इसमें तीन देश के प्रधानमंत्री व कई देशों से 57 प्रतिनिधि भी आएंगे।
पर, हाईकोर्ट के आदेश ने परेशानी बढ़ा दी है। दरअसल, हाईकोर्ट ने समुद्री किनारों की सुरक्षा व स्वच्छता के उद्देश्य से 2001 व 2005 में समुद्र किनारे कार्यक्रम के आयोजन पर रोक लगाई थी। इसके साथ ही एक कमेटी भी गठित की गई थी जिसको समुद्री किनारो की निगरानी का जिम्मा सौंपा गया था
सरकार ने मांगी थी अनुमति
राज्य सरकार ने भी समुद्र किनारे कार्यक्रम
आयोजित करने पर रोक लगाने को लेकर बनाए गए दिशा-निर्देशों को सहमति दी थी।
इसलिए समुद्र किनारे कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जा सकता। इस
दिशा-निर्देश के चलते महाराष्ट्र सरकार ने हाईकोर्ट में आवदेन कर कार्यक्रम की अनुमति मांगी थी।
इस आवेदन में एक से लेकर 15 फरवरी तक
गिरगांव का व्यापक समुद्री किनारा कार्यक्रम के आयोजन के लिए देने की
मांग की गई थी जिससे सरकार मेक इन इंडिया सप्ताहिक कार्यक्त्रस्म में आने
वाले लोगों के लिए पर्याप्त इंतजाम कर सके। राज्य के महाधिवक्ता श्रीहरि
अणे ने कहा कि मेक इन इंडिया काफी महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक कार्यक्रम है।
मुंबई विश्वभर में आकर्षण का केंद्र है। समुद्री किनारा उसकी खासियत है।
कार्यक्त्रस्म में आनेवाले विदेशी प्रतिनिधियों को यहां महाराष्ट्र की झाकी
दिखाई जाने वाली है। उन्होंने दलील दी कि गिरगांव का अपना एक ऐतिहासिक
महत्व है। मेक इन इंडिया कार्यक्रम लोकोत्सव व सार्वजनिक कार्यक्रम
जैसा है।
न्यायालय का एक ही मकसद, हो आदेश का पालन
गिरगांव में गणपति विसर्जन,नवरात्री के दौरान देवी
विसर्जन,रामलीला व कृष्णलीला के आयोजन किया जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार कार्यक्रम को लेकर अदालत की हर शर्त का पालन करने के लिए तैयार है।
सरकारी दलीलों को सुनने के बाद न्यायमूर्ति अभय ओक और न्यामूर्ति सीवी
भडंग की खंडपीठ ने कहा कि इसे राज्य के स्वर्ण जयंती समारोह के समकक्ष नहीं
रखा जा सकता। कोर्ट ने कहा-हमारा इससे कोई सरोकार नहीं है कि सरकार कार्यक्रम में आनेवाले लोगों को कैसे प्रभावित करती है। न्यायालय का एक
ही मकसद है कि उसके आदेश का पालन होना चाहिए।
चूंकि सरकार की सहमति से
दिशा-निर्देश मंजूर किए गए थे। इसलिए सरकार को भी इसे मानना चाहिए। खंडपीठ
ने कहा कि मूर्तियों के विसर्जन की परंपरा सदियों से चली आ रही है उसे
एकाएक नहीं बंद किया जा सकता है।