सात बार लोकसभा का चुनाव जीत चुकी सुमित्रा महाजन अप्रैल की चिलचिलाती धूप में भी गांवों के दौरों पर हैं। उनका उत्साह देखकर विश्वास नहीं होता कि वह पिछले 10-12 दिनों में इंदौर शहर में 200 बैठकें कर चुकी हैं।
शुक्रवार को नामांकन दाखिल करने के पहले वह अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के सत्यनारायण पटेल के गांव देपालपुर में ग्राम केंद्रों पर छोटी-छोटी बैठकें करने में व्यस्त हैं।
ताई के सहयोगी कमलेश नाचन बताते हैं, ‘ताई ने इंदौर शहर के 79 वार्डों में नगर केंद्रों की बैठकों का काम पूरा कर लिया है। अब 74 ग्राम केंद्रों काम जनसंपर्क चल रहा है।’ सुमित्रा महाजन सुबह छह बजे उठने के बाद से रात दस बजे तक इन बैठकों में लगी हैं।
आठवीं बार के लिए तैयार हैं ताई
जब 1989 में सुमित्रा महाजन ने पहली बार इंदौर से लोकसभा का चुनाव लड़ा था, उसके बाद शहर में बहुत कुछ बदल गया है। शहर ने अपना सांसद नहीं बदला।
मूलत: मराठी भाषी सुमित्रा महाजन, जिन्हें ताई के नाम से ज्यादा जाना जाता है, को यह शहर छह बार लोकसभा भेज चुका है। फिर भी यदि सुमित्रा ताई आठवीं बार लोकसभा जाती दिखाई देती हैं। वह पहली ऐसी महिला सांसद हैं जो 25 सालों से एक ही सीट से सांसद हैं।
कोई एंटी-इनकंबेंसी भी दिखाई नहीं देती तो उसका एक कारण यह भी है कि शहर में लोग नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की मुहिम के सामने दूसरी बातों को दरकिनार कर देते हैं।
शांति से चल रहा चुनाव प्रचार
न झंडे-पोस्टरों की भरमार है, न कोई शोर शराबा। यह आयोजनों का शहर है। इतना खामोश चुनाव प्रचार इंदौर शहर की फितरत में नहीं। लगता है हर कोई फैसला किए बैठा है।
मालवा मिल में फिटर रहे ओमप्रकाश पाटनीपुरा चौराहे पर गन्ने के रस की दुकान पर शाम का अखबार बेसाख्ता पड़े जा रहे हैं। वह बड़ी बेबाकी से कहते हैं, ‘इस बार तो नरेंद्र मोदी। बस और कुछ नहीं।’
1989 से पहले इंदौर सीट से भाजपा या जनसंघ कभी जीते नहीं थे और 1989 के बाद भाजपा कभी हारी नहीं। मिलों के चौराहों पर होमी दाजी के वामपंथी विचारों की जगह भाजपा के दबंग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और रमेश मेंदोला के संपन्नताभरे दक्षिणपंथी जलसों ने ले ली है।
रिकार्ड मतों से जीता थी बीजेपी
संघ के नेता कृष्णमुरारी मोघे जो एक समय सुमित्रा महाजन के संरक्षक हुआ करते थे, अब इंदौर नगर निगम के महापौर हैं।
कैलाश विजयवर्गीय ने महापौर के रूप में इंदौर के आधुनिकीकरण और सौंदर्यीकरण पर एक छाप छोड़ी है। उद्योगमंत्री के रूप में वह इंफोसिस और टाटा कंसल्टेंसी को इंदौर लाने की उपलब्धियां गिनाते हैं।
भाजपा की राजनीति में कैलाश विजयवर्गीय को सांसद सुमित्रा महाजन का विरोधी माना जाता है। पिछली बार कैलाश विजयवर्गीय के खास सिपहसालार रमेश मेंदोला की विधानसभा सीट इंदौर-2 से सुमित्रा महाजन को महज 700-800 वोटों की लीड मिली थी।
लोकसभा चुनाव में सुमित्रा महाजन की लीड करीब 11 हजार मतों पर सिमट गई थी। इस बार विधानसभा चुनावों में रमेश मेंदोला ने रिकार्ड 90,000 वोटों के अंतर से चुनाव जीता है।
भाजपा कर रही कड़ी मेहनत
कैलाश विजयवर्गीय और रमेश मेंदोला जिस तरह से प्रचार में लगे हैं, सुमित्रा महाजन की लीड के बारे में अच्छे अनुमान सामने आ रहे हैं। दाल मिल चलाने वाले दिनेश अग्रवाल का अनुमान है, ‘सुमित्रा ताई को करीब सवा लाख वोटों के अंतर से जीतना चाहिए।’
इंदौर लोकसभा में 23,96,000 मतदाता हैं। भाजपा के एक नेता बताते हैं, ‘आरएसएस ने कड़ी मेहनत की है। महाराष्ट्र और गुजरात से टीमें आई हैं। लीड अच्छी रखने पर सारा जोर है। गांवों में जमीनी स्तर पर काम किया जा रहा है।’
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सुमित्रा महाजन ने 1989 के बाद से शहर के लिए कुछ नहीं किया। ग्रामीण इलाके के लोगों से तो वह मिलती तक नहीं। पिछली बार सत्यनारायण पटेल केवल 11,000 वोट से हार गए वह भी प्रशानिक मशीनरी भाजपा के पास थी।
मुसलमान भी भाजपा को वोट देने लगे हैं
कांग्रेस को उम्मीद है कि इस बार चौंकाने वाले नतीजे आ सकते हैं। एलआईसी का काम करने वाले परवेज खान को लगता है, ‘कांग्रेस के नेता तो चुनाव लड़ने बाहर चले गए।
प्रेमचंद गुड्डू उज्जैन से लड़ रहे हैं। सज्जन वर्मा देवास से लड़ रहे हैं। मुसलमानों का एक तबका भाजपा को वोट देने लग गया है। कांग्रेस बिखरी हुई है।’