भारत में मैगी पर लगे प्रतिबंध के बाद भले ही नेस्ले को थोड़ा नुकसान हुआ हो लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनका तो पूरा रोजगार ही छिन गया। सरकार के इस फैसले के बाद नेस्ले जैसी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले करीब 1,100 लोगों की जिंदगी एकदम से ऐसी बदली की किसी को रिक्शा चलाने के लिए मजबूर होना पड़ा तो कोई चाय बेच रहा है।
नेस्ले के कई ऐसे कर्मचारी थे जो अब मजदूरी करके मुश्किल से अपने परिवार का पेट भरने के लिए दो जून की रोटी इकट्ठा कर पा रहे हैं। यह कहानी कहीं और की नहीं बल्कि नैनिताल के रुद्रपुर की है जहां नेस्ले की कंपनी में ठेके पर काम करने वाले करीब एक हजार से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए हैं।
इनमें से कई ऐसे लोग हैं जो देश के कई अलग-अलग राज्यों से आकर कंपनी में काम करते थे। इनमें यूपी, बिहार, उड़ीसा और मध्य प्रदेश आदि राज्यों के मजदूरों की संख्या सबसे ज्यादा है।
बाम्बे हाईकोर्ट के फैसले से थी आशा
उन्हीं में से एक यूपी के रहने वाले राजेंद्र सिंह (43) का कहना है कि जब हमने यह खबर सुनी तो हमें बहुत बड़ा धक्का लगा। उन्होंने कहा, 'हम कंपनी में रोज 300 टन मैगी का उत्पादन करते थे और अच्छे पैसे कमाते थे। इनमें से कुछ पैसा हम अपने घर भी भेज पाते थे। लेकिन काम बंद हो जाने की कारण हमें बहुत बड़ा झटका लगा है।परिवार का पेट भरने के लिए रिक्शा चलाना पड़ रहा है।'
सिंह की तरह ही कई ऐसे लोग हैं जो आस पास के जगहों पर रिक्शा चलाकर, चाय बेचकर, मजदूरी करके, होटलों में काम करके और दूसरों के घरों में काम करके अपने परिवार का गुजारा चला रहे हैं। बेरोजगार हुए लोगों का कहना है कि उन्हें बाम्बे हाईकोर्ट के फैसले का इंतजार था और उनको यकीन था की फैसला कंपनी के हक में ही जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
उनका कहना है कि कंपनी को क्लियरेंस मिलने के बाद फिर से काम शुरु होने की उम्मीद थी लेकिन अबतक ऐसा नहीं हो पाया है।
आत्महत्या भी कर रहे हैं कर्मचारी
हल्दवानी से मैगी का एक सैंपल एक बार फिर टेस्ट में फेल हो गया। उनका कहना है कि अगर जल्द से जल्द इस कोई कोई सकारात्मक फैसला नहीं हुआ तो उन्हें मजबूरन अपने गांव लौटना पड़ेगा।
बेरोजगार हुए इन लोगों में से कई तो ऐसे हैं जो पहले अपने गांव जा चुके हैं और कुछ अभी भी सब कुछ ठीक होने का इंतजार कर रहे हैं। मैगी पर प्रतिबंध लगने के कारण बंद हुए उत्पादन की वजह से लालता प्रसाद नाम के एक कर्मचारी ने आत्महत्या भी कर ली थी। वह कंपनी में दिहाड़ी पर काम करता था।
उसके साथ काम करने वाले लोगों का कहना था कि लालता कंपनी के बंद हो जाने की वजह से काफी परेशान था और अपने परिवार का गुजारा नहीं कर पाने की वजह से उसने ऐसा कदम उठाया। इन कर्मचारियों को अभी भी कंपनी में फिर से काम शुरु होने का इंतजार है और इसके लिए ये आज भी भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं।