भाजपा के मोदीमय होने से किनारे लगे लालकृष्ण आडवाणी को मोदी सरकार ने एक अहम जिम्मेदारी दी है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार आडवाणी को लोकसभा के नैतिकता समिति का अध्यक्ष बनाया गया है। इससे पहले सरकार और पार्टी के किसी भी निर्णायक मंडल में भूमिका से दूर आडवाणी को नए मार्गदर्शक मंडल का अध्यक्ष बनाया गया था।
वरिष्ठ नेता आडवाणी को पार्टी और सरकार में कोई भूमिका दी नहीं गई थी जिससे राजनीति से उनके रिटायर होने की चर्चा शुरू हो गई थी।
हालांकि आडवाणी ने खुद कभी राजनीति से संन्यास लेने की बात कभी नहीं की और न ही किसी पद के लिए भी पार्टी से मांग की।
क्या है लोकसभा की नैतिकता समिति?
रिपोर्ट के अनुसार लोकसभा की नैतिकता समिति लोकसभा सदस्यों के नैतिक आचरण पर निगरानी रखने का काम करती है।
सदस्यों के नैतिक आचरण से जुड़े किसी मामले पर शिकायत आने पर यह समिति शिकायत की जांच करती है और मामले अपनी प्रतिक्रिया देती है या नैतिक नियमों की व्याख्या करती है।
इसके साथ सदस्यों के अनैतिक कार्यों के मामले समित खुद भी संज्ञान लेती है और उस पर अपने सुझाव देती है या नए कानून बनानी है।
आडवानी के अलावा सरकार ने भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी को भी सक्रिय भूमिका देते हुए उन्हें मागदर्शक मंडल में शामिल किया गया है। इससे पहले डॉ. जोशी लोकसभा की इस्टीमेट कमेटी के अध्यक्ष थे।
कौन-कौन है नैतिकता कमेटी में?
इस नैतिकता कमिटी के एआईडीएमके के नेता ए अरुमोजिथेवान, कांग्रेस के निवांग इरिंग, आकाली दल के शेर सिंह गुबाया, शिव सेना के हेमंत तुकाराम गोडसे और भाजपा से करिया मुंडा, भगत सिंह कोशियारी, प्रहलाद जोशी, अर्जुन राम मेघवाल, जयश्री पटेल, सुमेधानंद सरस्वती, और भोला सिंह हैं।
हालांकि इस समित के अनुरूप ही लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन ने सदन में सरकारी अधिकारी के व्यवहार और सदन का प्रोटोकॉल तोड़ने वाले सदस्यों पर नकेल कसने के लिए एक सतिमि पहले ही बना चुकी हैं।
महाजन की इस समिति के अध्यक्ष तेलुगूदेशम पार्टी के रायपति संबाशिव राव हैं। यह समिति प्रमुख रूप से सदस्यों और अधिकारियों के बीच प्रोटोकॉल तोड़ने जैसे मामलों पर काम करती है।