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फोन पर पोर्न भेजने से हो सकती है जेल

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स्मार्टफोन के दौर से पहले, पोर्न से जुडी तस्वीरें और वीडियो मैगजीन, वीडियो टेप, वीडियो सीडी, कंप्यूटर, लैपटॉप या वीडियो पार्लर के जरिए देखे जाते थे। पर फोन पर इंटरनेट की सुविधा ने पोर्न को मानो आम इंसान के हाथ में पहुंचा दिया है।
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भारत में स्मार्टफोन की लोकप्रियता और सस्ती होती कीमत की वजह से वॉट्सऐप जैसे सोशल मीडिया के जरिए इसे देखना और बांटना दोनों ही आसान हो गया है। ये कम ही लोग जानते हैं कि भारत के आईटी ऐक्ट की धारा 67 के तहत ऐसी सामग्री जो कामुक हो और जिसे पढने, देखने और सुनने से किसी का चरित्र बिगड़ सकता हो, का इलेक्ट्रॉनिक तरीके से प्रकाशन या उसे बांटना दंडनीय अपराध है।

पहली बार प्रकाशन या बांटने के लिए दोषी पाए जाने पर एक लाख रुपए तक जुर्माना और पांच साल तक कैद और दोबारा दोषी पाए जाने पर दो लाख रुपये तक जुर्माना और दस साल तक की जेल की सजा हो सकती है।
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बच्चों से जुड़ा पोर्न भी भेजा जाता है

इसके साथ ही धारा 67ए 'सेक्सुअली एक्सप्लिसिट' सामग्री का इलेक्ट्रॉनिक तरीके से प्रकाशन या उसे बांटने को अपराध करार देती है। पहली बार दोषी पाए जाने पर पांच साल कैद, 10 लाख रुपए तक जुर्माना और दोबारा दोषी पाए जाने पर सात साल कैद और 10 लाख रुपए तक जुर्माना हो सकता है।

कोई व्यक्ति अगर लैपटॉप या कंप्यूटर के जरिए कुछ अपलोड करे या बांटे तो उसे ढूंढना मुमकिन है पर फोन के जरिए भेजी गई सामग्री की शुरुआत कहां हुई इसका पता लगाना बेहद मुश्किल।

फोन के जरिए सिर्फ साधारण वयस्क पोर्न नहीं भेजा जाता, बल्कि बच्चों से जुडा पोर्न और बलात्कार जैसी यौन हिंसा के वीडियो भी भेजे जा रहे हैं। हाल ही में मानव तस्करी के मुद्दे पर काम करने वाली हैदराबाद स्थित संस्था, 'प्रज्जवला' की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अर्जी डालकर कहा गया कि अगर किसी सोशल नेटवर्किंग साइट का इस्तेमाल बच्चों से जुडे हिंसक यौन अपराधों के वीडियो बांटने के लिए किया जा रहा हो, 'पीडोफीलिया' के मकसद से किया जा रहा हो तो इस साइट के खिलाफ भी कार्रवाई की जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का इनकार

'प्रज्जवला' की सह-संस्थापक डॉ सुनीता कृष्णन ने बीबीसी को बताया, “हमने अदालत से अपील की कि फेसबुक को निर्देश दें कि वॉट्सऐप के लिए एक ऐसा सॉफ्टवेयर इजाद करे जो ऐसी सामग्री के बांटे जाने को ना सिर्फ रोके बल्कि रिपोर्ट भी करे, और जबतक ऐसा ना हो, वॉट्सऐप को बंद कर दिया जाए।”

सुप्रीम कोर्ट ने 'बैन' की बात से तो इनकार कर दिया पर उचित कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। इंटरनेट एक खुली दुनिया है जिसमें आप तय नहीं कर सकते कि किसे क्या देखने का अधिकार है। साधारण पोर्न देखना भारत में कानूनी तौर पर बाधित नहीं है बल्कि सीमित मात्रा में देखे जाने को सेक्सॉलोजिस्ट सही मानते हैं।

ये समझना भी जरूरी है कि वॉट्सऐप के जरिए भेजी जा रही तस्वीरें या वीडियो एक छोटे या बडे समूह को तो बांटे जा रहे हैं लेकिन उन्हें देखने या डिलीट करने का फैसला एकदम निजी है। डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर बिशाखा दत्ता, मुंबई के गैर-सरकारी संगठन ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ की सह-संस्थापक हैं।
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इसे निजी अभिव्यक्ति समझते हैं

हाल ही में उन्होंने पोर्न पर बैन लगाने की सरकार की पहल (जिसे बाद में वापस ले लिया गया) से उठे सवालों पर एक कॉन्फ्रेंस आयोजित की। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “शायद हमारी उलझन की जड़ ये है कि हम यौन संबंध को एक निजी अभिव्यक्ति समझते हैं और नग्न शरीर की तस्वीरें देख असहज हो जाते हैं।”

उनके मुताबिक, “ये बहुत दुखद है कि मर्द पोर्न देखने में सहज है और महिलाएं अब भी शर्म महसूस करती हैं, यानी दोनों ही समाज के तय किए पुराने दायरों में फंसे हुए हैं, जबकि दुनिया ये समझ रही है कि मर्दों की ही तरह औरतों की भी सेक्सुअल डिजायर है और वो भी पोर्न से आनंद उठा सकती हैं।”

इंटरनेट की खुली दुनिया के विस्तार से औरतों को भी पोर्न देखने की आजादी मिली है क्योंकि अब ये एक गुप्त तरीके से किया जा सकता है। बहुत कम ही सही पर अब कुछ ऐसी पोर्न फिल्में बननी शुरू हुई हैं जो सिर्फ औरतों के नजरिए से, उनकी ‘सेक्सुअल सैटिसफैक्शन’ को ध्यान में रखते हुए बनाई जा रही हैं। कितने औरत और मर्द पोर्न देखते हैं, इसका कोई आधिकारिक अनुमान मौजूद नहीं है।

हालांकि एक अंतरराष्ट्रीय वेबसाइट ‘पोर्नहब’, उसे इस्तेमाल करने वालों के बारे में जानकारी जुटाकर सालाना आंकड़े प्रकाशित करती है। साल 2014 में ‘पोर्नहब इनसाइट्स’ द्वारा छापे गए भारत से जुडे आंकडों के मुताबिक उनकी वेबसाइट पर भारत से आनेवाले लोगों में से करीब 50 प्रतिशत, स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं।

भारत में बनी आम समझ से अलग, ‘पोर्नहब इनसाइट्स’ दावा करता है कि उनकी वेबसाइट इस्तेमाल करनेवालों में 25 प्रतिशत औरतें हैं। इस आंकडे पर चौंकने से पहले ये ध्यान में रखना जरूरी है कि इस वेबसाइट की जानकारी किस वर्ग के लोगों को होगी और वेबसाइट पर जाकर वो अपनी सही लैंगिक पहचान जाहिर करते होंगे या नहीं। ऐसे में इस आंकड़े को देश की मौजूदा तस्वीर तो नहीं, पर देश में हो रहे बदलाव की ओर इशारा मानना सही होगा।
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