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1947 में इस भारतीय को फहराना पड़ा पाक का झंडा

Sun, 16 Aug 2015 08:16 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, मुरादाबाद
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हमारा घर वैसे तो अविभाज्य भारत में पड़ता था मगर विभाजन के बाद बदले भूगोल ने हमें पाकिस्तानी बना दिया था। हमने एक दिन पहले 14 अगस्त सरकार ने सभी को घर पर देश का झंडा फहराने का आदेश जारी किया था।
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15 अगस्त, 1947 को हमारे घर पर चांद वाला झंडा फहराया गया। भारत से अलग होने का दर्द था, लेकिन चूंकि हम पाकिस्तान में ही रह गए थे, इसलिए हमें वह सब करना पड़ा, जो पाकिस्तान के दूसरे हिंदू नागरिक कर रहे थे।

एक सितंबर को उन घरों पर हमले शुरू हो गए, जो मुसलमानों के नहीं थे। औरतों की इज्जत लूटी जाने लगी। बुजुर्गों और महिलाओं की हत्याएं शुरू हो गई।

हम घबरा गए और पिता जी ने हमारी इज्जत बचाने के लिए हमें भारत भेज दिया। हम भारत आ गए और 1948 में हमारे गोरखपुर स्थित घर पर पहली बार भारत का झंडा फहराया गया।
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बंटवारे का दर्द बयां करते रो पड़ीं कृष्णा

डा. नितिन बत्रा की 81 वर्षीय माता कृष्णा बत्रा अमर उजाला से बंटवारे का दर्द बयान करते हुए रो पड़ती हैं। मुरादाबाद के डिप्टी गंज स्थित आवास पर हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि वह पाकिस्तान के गुजरात जिले की मंडी बहूदीन तहसील में रहती थीं।

उनके पिता हवेली राम पेशे से वकील थे। चाचा वगैरह का बड़ा कारोबार था। तहसील में ज्यादातर प्रापर्टी उनके खानदान की ही थी, लेकिन 09 सितंबर 1947 को सब कुछ छूट गया।

वह अपनी पांच बहनों और एक भाई के साथ अमृतसर आ गईं। पिता और चाचा तीन महीने के बाद भारत पहुंचे। तब तक हम गोरखपुर के कैम्पियरगंज तहसील में रहे।

क्लेम करने पर भारत सरकार ने हमें गोरखपुर के घासी कटरा में एक कोठी थी, जो एक मुसलमान परिवार की थी। उनका परिवार भारत छोड़कर पाकिस्तान चला गया था।
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खौफ के वो दिन, वीरान सड़कें, तेज रफ्तार गाड़ियां

कृष्णा बत्रा कहती हैं कि जब वह अपने परिवार के साथ ट्रक पर बैठ कर पाकिस्तान से रवाना हुई थी तो वे सब खौफजदा थीं। सड़के वीरान थीं। गाड़ियां तेज रफ्तार से भाग रहीं थी।

बीच में एक जगह पर कैंप मिला, जहां रुक कर उन्होंने रात गुजारी। भारत पहुंचने पर खुद को सुरक्षित तो समझने लगे, लेकिन पाकिस्तान छूटने का दर्द था। पल भर में सबकुछ छूट गया था।

पाकिस्तान में बड़ा सा घर था, आज भी कभी-कभी उसकी याद आती है। पता नहीं , वहां कौन रह रहा है। वहां के एक स्कूल में कक्षा नौ तक की पढ़ाई की है, इसलिए सब कुछ अच्छे से याद है।

1973 में परिवार के साथ मुरादाबाद बस चुकीं कृष्णा मानती हैं कि दोनों देशों के रिश्ते बहाल होने पर लोगों को राहत मिलेगी। लोग आसानी से एक दूसरे देश में जा सकेंगे।
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