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केजरी नहीं, भाजपा के लिए ही मुसीबत बनी बेदी

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दिल्ली की सियासी जंग में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी को चेहरा बनाने के बाद भी भाजपा आलाकमान की मुश्किलें कम नहीं हुई हैं। अपने चेहरों के मुकाबले बेदी को तरजीह देने से प्रदेश नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं की अंदरूनी कसक ने हाईकमान की चिंता बढ़ा दी है।
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दिल्ली के नेताओं की राजनीतिक बलि चढ़ाकर बेदी को नेतृत्व थमाने के प्रयास को पीएम मोदी को सियासी खरोंच से बचाने का कदम माना जा रहा है। वहीं भगवा परिवार के संगठनों में भी बेदी को कमान देने पर संशय और कयास लगने शुरू हो गए हैं।

बताया जा रहा है कि किरण बेदी को चेहरा बनाने के बाद आलाकमान को प्रदेश भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं की मनोदशा को लेकर मिले फीडबैक सुखद नहीं हैं। भाजपा आलाकमान खुफिया और विभिन्न सर्वे एजेंसियों के माध्यम से दिल्ली की सियासत पर बारीकी से नजर रखे हुए है।
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भाजपा नेताओं के दिल में नही बनी जगह

पार्टी ने केजरीवाल को पटखनी के देने के लिए मास्टर स्ट्रोक के रूप में बेदी को बेशक दिल्ली की कमान सौंप दी है, लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं के दिल में बेदी उतर नहीं पाई हैं।

हालांकि पार्टी में जुडे़ रहने और टिकट पाने की मजबूरी के कारण पार्टीजनों के तेवर बगावती नहीं हैं। लेकिन उनके मन में इस बात की कसक जरूर है कि 16 साल बाद जब मोदी लहर में दिल्ली की बागडोर भाजपा के हाथ आती दिख रही है, तो ऐसे समय में अपने चेहरों पर भरोसा करने के बजाय बेदी पर दरियादिली दिखाई जा रही है।

भगवा परिवार के संगठनों में भी बेदी को चेहरा बनाने की मजबूरी को लेकर कयास लगने शुरू हो गए हैं। ऐन चुनाव के मौके पर पाला बदलकर पार्टी का दामन थामने वाली शाजिया इल्मी को लेकर भी भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं में कड़ी प्रतिक्रिया है। पार्टी के एक नेता ने यहां तक कह दिया कि जो केजरी की न हो सकी, वह भाजपा में कैसे रहेंगी?

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