पार्टी का नाम 'आम आदमी पार्टी', लॉचिंग तिथि 26 नवंबर, इसके पीछे तर्क - आज ही के दिन 1949 में संविधान लागू हुआ। पार्टी में कोई अध्यक्ष नहीं, जनता जिन चीजों से त्रस्त है, उन्हें दूर करना पार्टी के उद्देश्य है।
अरविंद केजरीवाल न सिर्फ भ्रष्टाचार पर निशाना साधते हैं, बल्कि "हमें तो राजनीति करनी नहीं आती" कहकर एक नयी राजनीति का आगाज करते है। यानी उस आदमी को जुबान देते हैं जो राजनेताओं के सामने अभी तक तुतलाने लगता था।
केजरीवाल ने 2 अक्टूबर को आम आदमी को आधार बनाकर राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान किया। 5 अक्तूबर को राबर्ट वाड्रा पर निशाना साधा। 17 अक्तूबर को भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी और 31 अक्तूबर को मुकेश अंबानी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाया।
वह अपने इन आरोपों के जरिये यह संदेश दे रहे हैं कि नेताओं की एक बड़ी जमात भ्रष्टाचार में लिप्त है, और दूसरे सभी राजनीतिक दल खासकर कांग्रेस और भाजपा एक जैसे हैं।
आम आदमी अभी तक यह सोचकर घबराता रहा कि जिसकी सत्ता है अदालत भी उसी की है। इससे हटकर कोई रास्ता भी नहीं है। लेकिन केजरीवाल ने राजनीतिक न्याय को सड़क पर करने का नया रास्ता निकाला।
हर दस्तावेज को न्यायपालिका की जगह जन-अदालत में ले जा कर आरोपी की पोटली खोलते हैं। सिर्फ सत्ताधारी कांग्रेस ही नहीं बल्कि विपक्षी भाजपा और बाजार अर्थव्यवस्था के नायक अंबानी पर भी हमला करते हैं।
संसदीय सत्ता अपने होने को लोकतंत्र के पैमाने से जोड़ती रही, और लगातार आर्थिक सुधार के तौर तरीकों को देश के विकास के लिये जरुरी बताती रही।
केजरीवाल ने उन्हीं मु्द्दों को जनता से जोड़ा और संसदीय राजनीति को ही कटघरे में खड़ा कर दिया।
ऐसे लोगों की नब्ज पकड़ते हैं केजरीवाल
केजरीवाल कहते हैं कि आम आदमी सुबह उठता है, घर से ऑफिस या दुकान के लिए निकलता है। शाम तक जी-तोड़ मेहनत करता है, लेकिन अपने बच्चे के दाखिले के लिए उसे पचास हजार की रिश्वत देनी पड़ती है।
बदकिस्मती से अगर इलाज करवाना पड़ा तो जिंदगी भर की कमाई खत्म हो जाती है।
उन्होंने कहा कि पार्टी ऐसी व्यवस्था कायम करेगी, जिसमें आम आदमी अपना धंधा कर सके, उसके बच्चे को बेहतर शिक्षा मिले और उसकी बुनियादी जरूरतें पूरी हों।
केजरीवाल ने जनता के इसी ताकत की राजनीति को समझा और कमजोर होती सत्ता के मर्म को भी पकड़ा। मुकेश अंबानी के स्विस बैंक से जुडते तार को प्रेस कॉन्फ्रेन्स के जरिये उठाया।
मुकेश के स्विस बैक खातों के नंबर को बताने के लिये जन-संघर्ष का सहारा लिया। रैली के जरिए सरकार को जांच की चुनौती दे कर जनता के सामने यह सवाल छोड़ दिया कि वह सरकारी जांच पर टकटकी लगाये रहे।
राजनीतिक दल इसे "हिट एंड रन" के तौर पर देख रहे हैं। भाजपा इसे भारतीय लोकतंत्र को खत्म करने की साजिश मान रही है। यह तो भविष्य ही बताएगा कि टीम केजरीवाल जो संदेश देने की कोशिश कर रही है, उससे उसे राजनीतिक रूप से कोई लाभ होगा या नहीं। लेकिन इतना जरूर है कि उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।