प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के पीएम शिंजो एबे के बीच पिछले साल 30 अगस्त को काशी को क्योटो की तर्ज पर विकसित करने का करार हुआ था। 11 महीने बीत गए लेकिन काशी करार पर अमल के लिए बेकरार है। काशी की धरोहरों के संरक्षण, पर्यटन विकास और मूलभूत सहूलियतों के वादे बैठकों और दौरों तक सिमट गए।
काशी-क्योटो करार के बाद क्योटो के डिप्टी मेयर केनिची ओगासवारा के नेतृत्व में जापानी प्रतिनिधिमंडल अक्तूबर 2014 में दो दिन के लिए बनारस आया। तय हुआ कि काशी के सर्वांगीण विकास में क्योटो हर मदद देगा।
समझौते को आगे बढ़ाते हुए मार्च 2015 में क्योटो विश्वविद्यालय के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ ग्लोबल एनवायरमेंटल स्टडीज के डीन प्रो. शिजीओ फूजी की अगुवाई में जापानी राजनयिक, प्राध्यापकों, शोध छात्रों का दल भी यहां आया। उनके साथ भारतीय विदेश मंत्रालय और शहरी विकास मंत्रालय की टीमें भी थीं लेकिन निरीक्षण, बैठक और वादे से बात आगे नहीं बढ़ सकी।
इसके बाद अप्रैल में महापौर रामगोपाल मोहले की अगुवाई में पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल क्योटो और टोक्यो के दौरे पर गया। लौटते ही जापानी मदद से काशी के विकास के लिए 250 करोड़ रुपये की कार्ययोजना बनी लेकिन अभी तक इसका कोई ठोस रूप काशी के लोगों के सामने नहीं आ सका है।
अब तो जापान गए पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल में से तत्कालीन मंडलायुक्त आरएम श्रीवास्तव सेवानिवृत्त हो चुके हैं जबकि नगर आयुक्त उमाकांत त्रिपाठी का तबादला भी हो चुका है।
जायका की विफलता तो नहीं बनी रोड़ा
जापान इंटरनेशनल को आपरेशन एजेंसी (जायका) की मदद से काशी में सीवर, कम्युनिटी टॉयलेट व यूरिनल, जलनिकासी, धोबी घाट और गंगा घाटों की मरम्मत के काम चल रहे हैं।
इस मद में करोड़ों खर्च हो चुके हैं, मगर कहीं विवाद तो कहीं ठोस कार्ययोजना के अभाव में कोई भी परियोजना मुकाम तक नहीं पहुंच सकी। नगर निगम के अधिकारी भी दबी जुबान मानते हैं कि शायद क्योटो और काशी समझौते के लिए जापान इन्हीं सब कारणों से ठोस कदम नहीं उठा पा रहा है।
समझौते की पुस्तक बनी, काम नहीं हुआ
क्योटो और काशी के समझौते के बाद क्योटो विश्वविद्यालय के प्रो. राजीब शॉ के मार्गदर्शन में वहां के शोध छात्र रानित चटर्जी ने बनारस के आपदा प्रबंधन पर 90 वार्डों का अध्ययन किया और ‘क्लाइमेट एंड डिजास्टर रेसिलिएंस ऑफ वाराणसी’ नामक रिपोर्ट पेश की। इसमें काशी में आपदा प्रबंधन के सुझाव दिए गए हैं। यह रिपोर्ट आगे के अध्ययन के लिए बीएचयू को भी सौंपी गई लेकिन इस आधार पर भी बनारस में थोड़ा भी काम न हो सका।
पीएम मोदी और जापानी पीएम के बीच हुआ था करार
कोट्स
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काशी और क्योटो का समझौता नीतिगत मसला है। काशी में 33 हजार मंदिर हैं तो क्योटो में तीन हजार। दोनों शहरों में काफी असमानता है। प्रधानमंत्री ने पहल की है, हम मुकाम तक जरूर पहुंचेंगे। अभी रोडमैप बनाने पर काम चल रहा है, हम किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सके हैं।
- रामगोपाल मोहले, महापौर, वाराणसी
ये काम होने हैं, मगर शुरुआत तक नहीं
- काशी में कचरा व सीवेज प्रबंधन, जलापूर्ति, स्ट्रीट लाइट और जलनिकासी की मुकम्मल व्यवस्था
- काशी के पक्कामहाल व सारनाथ सहित अन्य हेरिटेज जोन का विकास और पर्यटन को बढ़ावा
- गंगा किनारे रिवर फ्रंट डेवलेपमेंट, पार्किंग, उन्नत ट्रैफिक मैनेजमेंट और जीरो होर्डिंग पालिसी
- गंगा की अविरलता और निर्मलता बरकरार रहने के लिए तकनीकी मदद
- काशी और क्योटो में एक-दूसरे की विशेषताओं वाले मेले व प्रदर्शनी का आयोजन
- क्योटो और और काशी में एक-दूसरे के केंद्र और अंतरभाषायी केंद्र व इंडस्ट्रियल जोन की स्थापना
- टोक्यो के फैशन रैंप पर काशी के सिल्क व हस्तशिल्प की पहचान
- वाराणसी नगर निगम की कार्यप्रणाली का क्योटो म्युनिसिपैलिटी की तरह विकास और उन्नत सुविधाओं की उपलब्धता