सिनेमा और रंगमंच की दुनिया में क्लासिक रचनाओं को आधुनिक रूप में पेश करने के प्रयोग जारी हैं। दर्शक भी इन्हें हाथों हाथ ले रहे हैं।
इस कड़ी में मंगलवार को मुंबई के गुलाबी थियेटर ने महाकवि कालिदास के सर्वाधिक लोकप्रिय संस्कृत महाकाव्य ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ को करीब 16 सदी बाद नए जमाने के अंदाज में प्रस्तुत किया गया।
‘दुष्यंतप्रिय’ नाम के इस नाटक की विशेषता यह है कि इसमें एक समलैंगिक (गे) प्रेम कथा को शकुंतला व दुष्यंत की कहानी के समानांतर उसी की तर्ज पर पिरोया गया है। शकुंतला को लेकर अपनी तरह का यह पहला प्रयोग है।
नाटक के निर्देशक सारंग भाकरे की योजना इस मराठी नाटक को मुंबई के बाद हिंदी समेत अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में दिल्ली और अन्य शहरों में भी मंचित करने की है।
यह मंचन दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा आईपीसी की धारा 377 को खत्म करने की चौथी बरसी के मौके कर किया गया था। धारा 377 के समाप्त होने के बाद दो समलैंगिक वयस्कों द्वारा एकांत में बनाए गए संबंध अपराध की श्रेणी में नहीं आते।
नाटक के भीतर नाटक
‘दुष्यंतप्रिय’ की कथा में नाटक के भीतर नाटक है। मंच के लिए तैयार किए जा रहे ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ के कलाकार उस समय संकट में पड़ जाते हैं, जब अभिनेत्रियां नाटक में काम करने से इंकार कर देती हैं। तभी निर्देशक लड़कों को ही लड़कियों की भूमिकाएं निभाने के लिए तैयार करता है।
कहानी में ट्विस्ट तब आता है, जब दुष्यंत की भूमिका निभा रहे सुशील और शकुंतला बने रोहित के बीच प्रेम पनपता है। जिस तरह राजा दुष्यंत गंधर्व विवाह करने के बावजूद शंकुतला को स्वीकार नहीं करता।
उसी तरह सुशील भी परिवार के दबाव में रोहित से प्रेम की बात से इंकार करता है, लेकिन भारतीय साहित्य की परंपरा को निभाते हुए कहानी का अंत सुखद दिखाया गया है।
--2.8 करोड़ के लगभग है देश में समलैंगिक महिला और पुरुष। (हमसफर ट्रस्ट के अनुसार)
‘हमारी कोशिश है कि समाज में प्रेम, विवाह और लिंग संबंधी पारंपरिक धारणाओं को खत्म किया जाए।’--सारंग भाकरे, नाटक के निर्देशक।