शांति राजनीतिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि ये जीवन जीने का तरीका है। सभी बच्चों को इसमें शामिल किया जाए। एक ऐसा अभियान चलाया जाए, जिसमें शांति की स्थापना के लिए सभी बच्चों को जोड़ जा सके। अभियान का नाम हो- चिल्ड्रेन फॉर पीस, पीस फॉर चिल्ड्रेन। यानी अमन के लिए बच्चे और बच्चों के लिए अमन। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी ने ये प्रस्ताव मलाला युसुफजई के सामने रखा।
सत्यार्थी ने ये जानकारी अमर उजाला द्वारा आयोजित संवाद कार्यक्रम में दी। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान की मलाला युसुफजई को सत्यार्थी के साथ संयुक्त रूप से इस वर्ष का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया है।
एक सवाल के जवाब में सत्यार्थी ने कहा कि जिस दिन नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा हुई, उसी दिन मलाला युसुफजई से फोन पर बातचीत हुई। सत्यार्थी ने बताया कि उन्होंने मलाला से आग्रह किया कि वे दोनों मिलकर 'चिल्ड्रेन फॉर पीस, पीस फॉर चिल्ड्रेन' के लिए काम करें, यानी एक अभियान चलाया जाए, जहां बच्चे और युवा शांति के लिए जुड़ सकें।
सत्यार्थी ने बताया कि जैसे वे दुनिया के अन्य मुल्कों में बच्चों के अधिकारों के लिए वे लड़ रहे हैं, वैसे ही पाकिस्तान के बच्चों के अधिकारों के लिए भी लड़ते रहे हैं।
कम हो रही नैतिकता और करुणा
सत्यार्थी ने कहा कि समाज में दो चीजों का ग्राफ तेजी से गिरा है। पहला मोरल डेफिसिट यानी नैतिकता का संकट और दूसरी कॅम्पैसन डेफिसिट यानी करुणा की अभाव।
उन्होंने कहा कि हम सभी बनावटी जीवन जीने लगे हैं। नैतिकता का स्तर पूरी दुनिया में नीचे जा रहा है। मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों पर अधिक खर्च कर रहे हैं, फिर भी नैतिकता कम होती जा रहा है। हम झूठ बोलने लगे हैं, शार्टकट से आगे बढ़ने की कोशिश करने लगे हैं। नैतिक ह्रास हो रहा है।
सत्यार्थी ने कहा कि नैतिकता कि ह्रास के साथ ही करुणा का भी ह्रास हुआ है, विशेषकर सामाजिक करुणा का। उन्होंने कहा कि नैतिकता और करुणा का ह्रास हमारे लिए चुनौती हो गया है।
संवाद कार्यकम्र में सत्यार्थी ने बचपन बचाओ आंदोलन की गतिविधियों पर भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम में कैलाश सत्यार्थी की पत्नी सुमेधा भी मौजूद थीं।