आमतौर पर खोजी पत्रकारिता नेताओं की कुर्सियां हिलाती है, लेकिन पिछले सप्ताह भारतीय समाचारपत्र, 'द इंडियन एक्सप्रेस' में एक खबर छपने के बाद से अब पत्रकारों की कुर्सियां हिल रही हैं।
खबर के मुताबिक कई पत्रकार एस्सार नाम की कंपनी के खर्चे पर टैक्सी जैसे फायदे उठाते रहे हैं। आरोप मामूली हैं, लेकिन फिर भी अनैतिकता स्वीकारते हुए एक महिला और एक पुरुष संपादक ने अपने-अपने अखबारों से इस्तीफा दे दिया है। एक टीवी समाचार चैनल में काम करने वाली एक और महिला पत्रकार को आंतरिक जांच के चलते काम से हटा दिया गया है।
भारतीय पत्रकारों पर पहली बार उंगली नहीं उठ रही है। 2009 में भी कुछ फोन टेप सामने आए थे। आयकर विभाग की चंद पत्रकारों और सियासी बिचौलियों की फोन पर बातचीत की गुप्त रिकॉर्डिंग से लग रहा था कि वो पत्रकारिता कम और दलाली ज्यादा कर रहे थे।
वैसे तो नेताओं और उद्योगपतियों से अखबारों की सांठ-गांठ का सिलसिला पुराना है, लेकिन भारतीय पत्रकारों के चाल-चलन में मूल्यों की व्यापक गिरावट खासतौर से पिछले 25 सालों में आई है।
इसके चार प्रमुख कारण हैं। पहला, पत्रकारों को मिले विशेष कानूनी संरक्षण का पतन। दूसरा, खबर की बजाए मुनाफे को प्राथमिकता। तीसरा, समाचार संगठनों में उद्योगपतियों का निवेश। और चौथा, पत्रकारों के निजी स्वार्थ।
पत्रकारिता की स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण देते हुए भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1955 में वर्किंग जर्नलिस्ट एंड अदर न्यूजपेपर एम्पलॉइज एक्ट बनाया था।
इस कानून ने पत्रकारों की मनमानी बर्खास्तगी पर रोक लगा दी और जमीर का हवाला देते हुए पत्रकार के इस्तीफे को स्वत: लेबर विवाद का दर्जा दिया। नियुक्तियों, छुट्टियों और पदोन्नति इत्यादि के नियम निर्धारित किए।