संसद में जारी लगातार हंगामे के कारण कई महत्वपूर्ण विधेयकों के अटकने से सांसत में आई सरकार ने बुधवार को जदयू से संपर्क साधा।
संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ ने जदयू अध्यक्ष शरद यादव से न केवल कार्यवाही में हंगामे की वजह से आ रही बाधा को दूर करने पर सलाह मांगी, बल्कि कुछ जरूरी बिलों पर समर्थन भी मांगा। यादव ने खाद्य सुरक्षा और पेंशन बिल पर सरकार का समर्थन करने का आश्वासन दिया।
कई अहम बिल अधर में लटके
मानसून सत्र के पहले दिन से ही कई मुद्दों पर जारी घमासान के कारण कई अहम बिल अधर में लटक गए हैं। सरकार अब तक तेलंगाना के समर्थन और विरोध पर उतारू सांसदों को नहीं मना पाई है तो दूसरी ओर कोलगेट मामले की कई फाइलें गुम हो जाने को भाजपा ने बड़ा मुद्दा बना लिया है।
हंगामे के कारण सरकार अपनी ओर से पूरी तैयारी के बावजूद खाद्य सुरक्षा विधेयक पर चर्चा तक शुरू नहीं करा पाई है।
सूत्रों के मुताबिक शरद यादव ने खाद्य सुरक्षा और पेंशन विधेयक का तो समर्थन करने का आश्वासन दिया मगर इसके साथ ही कोलगेट मामले की गुम हुई फाइलों पर प्रधानमंत्री का बयान कराने की सलाह दी।
फूड बिल पास कराना बड़ी चुनौती
खाद्य सुरक्षा विधेयक के पारित होने पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। मानसून सत्र के खत्म होने में सिर्फ आठ दिन बचे हैं। मगर बिल को संसद से मंजूरी दिलवाने में सरकार और कांग्रेस अभी तक नाकाम रही है।
लिहाजा, पार्टी के लिए करो या मरो की स्थिति बन गई है। कांग्रेस के मैनेजरों की माने तो बृहस्पतिवार को बिल का भाग्य तय हो सकता है।
सरकार ने संसद में सहयोग के लिए सपा, बसपा, जदयू से संपर्क साधा है। साथ ही भाजपा को भी मनाने में सरकार के मैनेजर जुटे हुए हैं। कोयला घोटाले की अंधेरी राह से निकलना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
अगर आने वाले दिनों में भी बिल को मंजूरी नहीं मिलती तो सरकार इसे सत्र के आखिरी दिन हंगामे के बीच में ही पारित करवाने के विकल्प पर विचार कर रही है।
खाद्य सुरक्षा बिल को यूपीए के अंदर ही नहीं बल्कि बाहर भी पूर्ण राजनीतिक समर्थन हासिल है। सपा, जदयू, बसपा के अलावा भाजपा भी सैद्धांतिक रूप से इसके समर्थन में है। फिर भी बिल का भविष्य संकट में है।
मानसून सत्र 30 अगस्त को खत्म हो रहा है। अगर मौजूदा मानसून सत्र में बिल को संसद की मंजूरी नहीं मिलती तो बिल रद्द हो सकता है। साथ ही कांग्रेस और यूपीए सरकार के लिए यह एक बड़ा झटका होगा।
बिल के मंजूर नहीं होने की स्थिति में सरकार को नया अध्यादेश लाना पड़ेगा, जबकि हरियाणा, दिल्ली और उत्तराखंड जैसे कांग्रेस शासित राज्यों में धूमधाम से लागू की गई योजना को वापस लेना पड़ेगा।
इस फजीहत से बचने के लिए कांग्रेस और सरकार के मैनेजर हर कोशिश में लगे हुए हैं। कांग्रेस सूत्रों की माने तो बृहस्पतिवार को बिल का भाग्य तय करने की सरकार की पूरी कोशिश रहेगी।
कई रणनीतिकारों का यहां तक कहना है कि अगर बृहस्पतिवार को पारित नहीं हुआ तो फिर हंगामे के बीच में ही बिल को पास कराने की कोशिश की जाएगी। किसी भी सूरत में बिल को रद्द होने की नौबत को सरकार और पार्टी आने देना नहीं चाहती।