अब तक सपा और बसपा के सहारे संसद सत्र की गाड़ी खींचने वाले यूपीए को मानसून सत्र में एक और संकटमोचक मिलने की पूरी उम्मीद है।
भाजपा से 17 साल पुराना संबंध खत्म होने के बाद जद-यू यूपीए का नया संकटमोचक साबित हो सकता है। इसके लिए कांग्रेस लगातार जद-यू पर डोरे डाल रही है। जद-यू की तरफ से भी उसे सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं।
हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खाद्य सुरक्षा विधेयक का समर्थन करने का संकेत दे कर अपना भावी रुख स्पष्ट कर दिया है।
हालांकि इसके बदले नीतीश की योजना यूपीए सरकार से मोलभाव करने की है, जिससे बिहार में विकास कार्य जारी रहने का राजनीतिक संकेत दिया जा सके।
इसके लिए नीतीश सत्र के दौरान पटना से ही पार्टी सांसदों को नियंत्रित करेंगे। हालांकि जद-यू और कांग्रेस की यह गाड़ी किन-किन मुद्दों पर कितनी दूर तक सफर करेगी, इस पर दोनों दल अपना रुख स्पष्ट नहीं कर रहे हैं।
दरअसल, भाजपा-जदयू के अलगाव से सबसे ज्यादा खुश कांग्रेस है। नई परिस्थितियों में कांग्रेस और जद-यू दोनों को ही एक दूसरे की जरूरत है। कांग्रेस की तात्कालिक जरूरत जद-यू की सहायता से मानसून सत्र में महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने की है।
उधर, जदयू की रणनीति राज्य के लिए अधिक से अधिक केंद्रीय मदद हासिल करने की। यही कारण है कि अलगाव के बाद महाबोधि मंदिर में हुए आतंकी हमला और सारण में जहरीले मिड डे मील से हुई दो दर्जन बच्चों की मौत के बाद भी कांग्रेस का रुख रक्षात्मक रहा।
इसके एवज में यूपीए सरकार की गेमचेंजर मानी जाने वाली खाद्य सुरक्षा योजना को नीतीश ने अच्छी योजना बताया। हालांकि अलगाव के बाद भी इस मामले में अध्यादेश जारी करने पर पार्टी अध्यक्ष शरद यादव ने यूपीए सरकार की तीखी आलोचना की थी।
वैसे भी भाजपा से दूरी बनाने के बाद नीतीश की योजना राज्य में विकास के पहिये को थमने नहीं देने का है। उनकी रणनीति केंद्रीय सहायता से विकास के पहिये को और गति देने की है, जिससे राज्य में जद-यू और सरकार के प्रति सकारात्मक रुख पैदा हो।
इसके लिए नीतीश की यूपीए सरकार का समय-समय पर बचाव करना मजबूरी है। जद-यू सूत्रों का कहना है कि नीतीश के नए रुख से सबसे अधिक परेशानी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव को होगी।
अब तक घोर कांग्रेस विरोध की राजनीति करते रहने वाले शरद को ही लोकसभा में विभिन्न विधेयक पर कांग्रेस का समर्थन करने के तर्क तलाशने होंगे।