पीएम पद की उम्मीदवारी को लेकर भाजपा में भले ही नरेंद्र मोदी के लिए मुहिम चल रही हो, लेकिन भाजपा की मौजूदा और पूर्व सहयोगी दलों में पार्टी के अन्य नेताओं के समर्थक भी हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहली पसंद अरुण जेटली हैं तो पीए संगमा लालकृष्ण आडवाणी के पक्ष में हैं। आडवाणी के नाम पर नवीन पटनायक भी समर्थन देने को राजी हो सकते हैं।
मौजूदा समय में सिर्फ अकाली दल मोदी के पक्ष में है। शिवसेना की पहली पसंद सुषमा स्वराज हैं। एनडीए का विस्तार करने के लिए भाजपा की जिन दलों पर नजर है उनमें तमिलनाडु में जयललिता की अन्नाद्रमुक भी है। जयललिता मोदी को समर्थन दे सकती है, लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मोदी के सख्त खिलाफ हैं। वे मोदी के पीएम उम्मीदवार बनाने की स्थिति में अलग रास्ता चुन सकते हैं।
माना जाता है कि नीतीश कुमार की पहली पसंद अरुण जेटली हैं। हालांकि वे आडवाणी और राजनाथ सिंह के नाम पर भी सहमत हो सकते हैं। यह भी माना जाता है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी नीतीश की सलाह मान सकती हैं।
इनके अलावा हरियाणा जनहित कांग्रेस सुषमा के साथ रहेगी, जबकि जरूरत पड़ी तो ओमप्रकाश चौटाला आडवाणी के नाम पर हामी भर सकते हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा भी मोदी के नाम पर शायद ही सहमत हो। टीडीपी व तेलंगाना राष्ट्र समिति के लिए भी मोदी के नाम पर सहमत होना आसान नहीं होगा।
बहरहाल, आगामी लोकसभा चुनाव में उतरने की तैयारी में जुटी भाजपा को अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता की कमी खल रही है, जो एनडीए के सर्वमान्य नेता थे। भाजपा मानती है कि आज का एनडीए 1996 के एनडीए से काफी अलग है। आज इसमें केवल सात दल हैं। साथ ही वाजपेयी जैसा नेता भी नहीं है।
ऐसे में अगर चुनाव बाद केंद्र में एनडीए की सरकार बनने की संभावना बनी तो राजग के घटक दल भाजपा की बजाए नेताओं के नाम पर समर्थन देंगे। मोदी के नाम पर कांग्रेस को शिकस्त देने की रणनीति पर काम कर रही भाजपा भी जानती है कि उनका पीएम तभी बन सकता है जब वह अकेले दम पर 150-160 सांसदों का आंकड़ा पार कर ले। इतनी संख्या जुटाने के बाद एनडीए का कारवां भी बढ़ जाएगा।