पंडित जवाहर लाल नेहरू और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के राजनीतिक रिश्ते सामान्य नहीं थे। भारतीय स्वंतत्रता आंदोलन और उसके बाद की राजनीति का यह जगजाहिर तथ्य है। इंटेलिजेंस ब्यूरो की दो फाइलों ने दोनों नेताओं के रिश्तों की बावत नया खुलासा किया है।
आईबी के गुप्त दस्तावेजों से विवर्गिकृत की गई दो फाइलों के मुताबिक जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने नेताजी सुभाषचंद बोस के परिजनों की दो दशकों तक जासूसी कराई थी। 1948 से 1968 के दरम्यान यानी 20 सालों तक बोस के परिजनों की अभूतपूर्व ढंग से निगरानी की गई।
उल्लेखनीय है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू 1947 से 1964 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे और आईबी उन्हें सीधे रिपोर्ट करती थी।
आईबी ने रखी बोस के परिजनों पर नजर
फिलहाल नेशनल आर्काइव में रखी फाइलों के मुताबिक बोस के दो मकानों-1, वुडबर्न पार्क और 38/2 एल्गिन रोड की निगरानी ब्रिटिश शासन के दिनों से हो रही थी। नेहरू ने आजादी के बाद भी उसे कायम रखा।
बोस के परिजनों के पत्रों को रोका जाता या उन्हें कॉपी कर नेहरू के पास भेज दिया जाता। आईबी के जासूस बोस के परिजनों पर नजर रखते थे। विदेशी या घरेलू यात्राओं के दौरान उनका पीछा भी किया जाता।
दस्तावेजों से लगता है कि आईबी ये जानना चाहती थी कि बोस के परिजन किससे मिलते हैं, और क्या बातचीत करते हैं। हाथ से लिखे कई ऐसे संदेश सामने आए, जिसमें आईबी के एजेंटों ने सिक्योरिटी कंट्रोल को फोन किया है और बोस के परिजनों के 'मूवमेंट' की जानकारी दी है। दस्तावेजों में आईबी के हेडक्वार्टर को सिक्योरिटी कंट्रोल कहा गया है।
बोस के परिजनों ने आश्चर्य जताया
नेताजी के दो रिश्तेदारों सिसिर कुमार बोस और अमिय नाथ बोस पर आईबी की नजर सबसे ज्यादा थी। एजेंसी ऐसा क्यों कर रही थी, ऐसा दस्तावेजों से स्पष्ट नहीं है। 1930 और 1940 के दशक में नेताजी कांग्रेस की राजनीति में बहुत ही सक्रिय थे। उन्हीं दो दशकों में सिसिर और अमिय भी उनके साथ जुड़कर सक्रिय राजनीति कर रहे थे। ये दोनों नेताजी के भाई शरत चंद्र के बेटे थे।
उन्होंने नेताजी की पत्नी ऐमिली शेंकल को पत्र भी लिखे थे, जो उन दिनों ऑस्ट्रिया में रहती थीं।
जासूसी की खबरों पर बोस के परिजनों ने आश्चर्य जताया है। कोलकाता में रहने वाले चंद्र कुमार बोस ने कहा कि जासूसी उनकी कराई जाती है, जिन्होंने अपराध किया हो। नेताजी ने आजादी के लिए लड़ाई लड़ी थी। उनके परिवार की जासूसी क्यों कराई गई?
1945 में प्लेन क्रैश में हुई थी नेताजी की मौत
नेताजी की इकलौती बेटी अनिता बोस-फॉफ ने कहा, 'जासूसी की खबरों से मैं भौंचक्की हूं। मेरे चाचा शरत चंद्र 1950 के दशक में राजनीतिक रूप से सक्रिय थे। उन्हें कांग्रेस से कई असहमतियां थी। मुझे आश्चर्य है कि मेरे चचेरे भाइयों की जासूसी कराई गई, जबकि उनसे किसी प्रकार सुरक्षा का खतरा भी नहीं था।'
उल्लेखनीय है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे, हालांकि महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू से मतभेद के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा था। बाद के दिनों में ब्रिटिश सरकार की नजरबंदी से निकलकर वह जर्मनी चले गए।
1943 उन्होंने 40 हजार सैनिकों की आजाद हिंद फौज की स्थापना की। जर्मन तानशाह हिटलर और जापान की सहयोग से उन्हें द्वितीय विश्वयुद्घ के दरम्यान अंग्रेजी फौजों के खिलाफ लड़ाई भी छेड़ी। माना जाता है कि 18 अगस्त, 1945 को ताइवान में एक प्लेन क्रैश में उनकी मृत्यु हो गई। उस समय वह मात्र 48 वर्ष के थे।