सटीक रणनीति, आक्रामक शैली, सधी चाल और राजनीतिक परिपक्वता। भाजपा नेताओं की जाट आरक्षण को लेकर यही फुलप्रूफ प्लानिंग उसे लाभ दिला सकती है। जिस तरह से भाजपा नेता सक्रिय हुए और प्रधानमंत्री ने इस मसले पर कमेटी बनाने की घोषणा की, उसे नुकसान को फायदे में बदलने की रणनीति माना जा रहा है।
दरअसल भाजपा में जाट सांसदों की संख्या अच्छी खासी है, ऐसे में उनकी लॉबी अपने वोटरों को समझाने के लिए मजबूत मुहिम चला रही है। भाजपा भी उन्हीं के सहारे जाट आरक्षण के मामले में अब फ्रंट पर है। ये जाट सांसद अपनी बिरादरी को यह समझाने में जुट गए हैं कि केंद्र सरकार का जाट आरक्षण रद्द होने में कोई रोल नहीं है। और सब कुछ पूर्ववर्ती केंद्र सरकार की देन है।
भाजपा के जाट सांसद यह भी जानते हैं कि आरक्षण रद्द होने से जाट समाज फिर से रालोद की ओर लौट सकता है। इसीलिए वे कांग्रेस सरकार के कमजोर तथ्यों को आधार बनाते हुए प्रचार कर रहे हैं कि अब हमारी सरकार है, आरक्षण तो लेकर रहेंगे। जिससे भाजपा के पक्ष में समर्थन और मजबूत हो।