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मोदी की साख बचाने के लिए जेटली बनेंगे बलि का बकरा?

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भाजपा और केंद्र सरकार का एक वर्ग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फीकी पड़ रही चमक का ठीकरा वित्त मंत्री अरुण जेटली के सिर मढ़ने की कोशिश में है।
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इसके तहत जेटली की कार्यशैली को लेकर संघ के शीर्ष अधिकारियों में उनके खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास हो रहा है। इसमें जुटे नेताओं की कोशिश है कि पीएम मोदी की कमजोर पड़ रही जन हितैषी छवि का दोष जेटली पर डाल दिया जाए।

पीएम के रूप में मोदी के एक साल पूरे होने पर उनके कामकाज को लेकर चल रहीं अनौपचारिक चर्चाओं के बीच संघ के अधिकारियों को मोदी के नेतृत्व पर तो अब भी भरोसा है। मगर यह महसूस किया जा रहा है कि पीएम बनने के बाद मोदी की छवि वैसी नहीं रही है जैसी गुजरात का मुख्यमंत्री रहते थी।
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वैसे मोदी को करीब से जानने वाले एक भाजपा नेता का कहना है कि कांग्रेस की तरह ही मोदी भी सफलताओं को खुद के खाते में जोड़ते हैं। तो विफलता का दोष दूसरों के सिर मढ़ते हैं। यह माना जा रहा कि महज एक भूमि अधिग्रहण बिल ने मोदी की छवि को नुकसान पहुंचाया है।
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संघ ने बनाई नई रणनीति

संघ मानता रहा है कि लोकसभा चुनाव में मोदी को अपार बहुमत मिलने में मनमोहन सरकार की आर्थिक विफलता का बड़ा योगदान था। लेकिन मोदी के आने के बाद भी देश की आर्थिक नीतियों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

अलग छाप दिखने के बजाय मोदी सरकार के बारे में यह धारणा बनती जा रही है कि वह यूपीए की नीतियों को ही आगे बढ़ा रही है। केंद्र सरकार के कामकाज को लेकर संघ में बेहद चिंता है। संघ की तमाम नसीहतों के बावजूद मोदी सरकार देश की आर्थिक स्थितियों में हलचल नहीं ला सकी है।

कोयला और स्पेक्ट्रम की नीलामी से भारी भरकम धन सरकार के खजाने में आने जैसे कदम की जनता में चर्चा तक नहीं है। पूर्व मंत्री अरुण शौरी के आरोपों ने संघ की चिंताओं को और बढ़ा दिया है।

राज्यसभा में विपक्ष के साथ सरकार के तार न जुड़ पाने का दोष भी जेटली के सिर मढ़ा जा रहा है क्योंकि वह सरकार के मुख्य रणनीतिकार के तौर पर विपक्ष और खासतौर से कांग्रेस को साधने में सफल नहीं रहे हैं।
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